राहुल गोस्वामी @स्वतंत्र बोल
रायपुर 04 जनवरी 2026. प्रदेश के सभी सरकारी विश्वविद्यालयो के अधिकारी और कर्मचारियों पर कार्यवाही और जाँच के संबंध में लोकभावन(राजभवन) ने आदेश जारी किया है। आदेश के अनुसार विश्वविद्यालयो के अधिकारी और कर्मचारियों पर कार्यवाही करने के पूर्व लोकभवन(राजभवन) से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस आदेशों के बाद विश्वविद्यालयो के उदंड और भ्र्ष्ट किस्म के कर्मियों के बल्ले बल्ले हो गई है जो ऐसी गतिविधि में शामिल है और उन पर राज्य सरकार कार्यवाही वाली है। विश्वविद्यालयों को अपने नियंत्रण ले लेने का संभवतः समूचे देश का पहला लोकभवन( राजभवन) छत्तीसगढ़ का बन गया है, अन्य राज्यों में ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता है। लोकभवन से 30 दिसंबर 2025 को जारी आदेश को सरकार से जुड़े लोगो द्वारा सरकार के कार्यो में सीधा दखल बताया जा रहा है। अब सवाल उठता है आखिर इस आदेश की जरुरत क्या थी ? यह जानने के लिए विश्वविद्यालयो के सिस्टम को समझाना होगा। दरअसल प्रदेश के राज्यपाल सरकारी विश्वविद्यालयो के कुलाधिपति होते है, विश्वविद्यालयो में कुलपति नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल द्वारा किया जाता है,, और विश्विद्यालयीन कर्मचारियों के पालक/ अपीलीय अधिकारी होते है। विश्वविद्यालयो में कार्यपरिषद सक्षम समिति है जो निर्णय लेती है और उससे असहमत होने वाले कुलाधिपति/राज्यपाल से समक्ष अपील कर सकते है। अब जब लोकभवन (राजभवन) ही जांच की अनुमति दे या कार्यवाही करेगा तो अपील कहा और किससे किया जायेगा ?
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प्रदेश के अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालयो में भर्ती में अनियिमितता, पैसो के लेनदेन, प्रमोशन में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायते है। एक अनुमान अनुसार बीते 5 वर्षो में करीब 300 से अधिक शिकायते विश्वविद्यालय प्रबंधन की रही पर किसी पर भी कोई बड़ी कार्यवाही नहीं हुई। विश्वविद्यालय खुले तौर पर भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए है, शिकायते लोकभवन में धूल खा रही है और घोटाले/ भ्रष्टाचार करने वाले मौज में है। ऐसे में लोकभवन द्वारा कार्यवहाई करने की बजाये सरंक्षण देने जैसा आदेश जारी करना उदंडता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला होगा।
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय का भर्ती और बीज खरीदी घोटाला, उद्यानिकी विश्वविद्यालय का भर्ती घोटाला जिसमे कुलपति कुरील को पद गवाना पड़ा, महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय का भर्ती घोटाला, रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में भ्रषचार और आर्थिक अनियमितता, अटल बिहारी विश्वविद्यालय में खरीदी में करोडो का घोटाला, सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय में तत्कालीन कुलपति का भ्रष्टाचार सहित सैकड़ो मामले है जिन पर कार्यवाही कर सरकार को मेसेज देना था, जेरो टॉलरेंस किताबो नारो से बाहर दिखना था पर कमीशनखोरी और हिसेदारी ने शिकायतों और जाँच का पिंडदान कर दिया। मौजूदा समय में विश्वविद्यालयो की स्थिति सार्वजनिक है, एक तरफ केंद्र सरकार नई शिक्षा निति के माध्यम से युवाओ को उच्च शिक्षित करने पहल कर रही तो छत्तिसगगढ़ में सरकार और लोकभवन (राजभवन) भ्रष्टाचार और उदंडता के शिकायतों पर मिनारे बना रही है। तो समझा जाए कि भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारियों को बचाने और सरंक्षण देने लोकभवन ने 30 दिसंबर को आदेश जारी किया है ?
शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय में अधेड़ और अपात्रो की नियुक्ति का मामला विधानसभा में बीजेपी के सीनियर विधायक अजय चंद्राकर ने उठाया तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव से ने जाँच और कार्यवाही का आश्वसन दिया था। जाँच पड़ताल और रिपोर्ट के आठ महीनो बाद भी कार्यवाही नहीं हो पाई है, बिलासपुर के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव ने करोडो की खरीदी में फर्जीवाड़ा किया, शासन ने टीम भेजकर रिपोर्ट मांगा तो शिकायते सही पाई गई, पर कार्यवाही नहीं हो पाई है। यह समझना होगा कि बिलासपुर विश्वविद्यालय के कार्यपरिषद द्वारा ही कुलसचिव की नियुक्ति के संबंध में प्रस्ताव पारित कर लोकभवन (राजभवन) को भेजा था। संभवतः उसके बाद ही लोकभवन ने आदेश जारी किया है।
कांग्रेस ने पहले ही लगाया आरोप-
राज्यपाल डॉ रमेन डेका राज्यपाल बनने के बाद प्रदेश के सभी जिलों में जाकर बैठके ले चुके है। रायपुर कलेक्टर, कमिशनर, उच्च शिक्षा सचिव की व्यक्तिगत बैठक लेकर सुधर करने निर्देशित कर चुके है। कांग्रेस के उन आरोपों को बल मिलता है जिसमे कहा गया था कि राज्यपाल सरकार चला रहे और सरकारी काम में दखल दे रहे है। कांग्रेस ने प्रेस रिलीज जारी कर सवाल उठाया था कि छत्तीसगढ़ केंद्र शाषित प्रदेश तो है नहीं फिर ऐसा क्यों ?

