दहेज केस में हाईकोर्ट का बड़ा संदेश! राहत तो मिली, लेकिन पति-सास-ससुर के सामने रख दी ऐसी शर्त कि बढ़ गई मुश्किलें

स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 04 जून 2026:  दहेज प्रताड़ना और शारीरिक उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए पति, सास और ससुर को अंतरिम राहत तो दी है, लेकिन इसके साथ ऐसी शर्त भी लगा दी है जिसने मामले को नई दिशा दे दी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर एक लाख रुपये जमा नहीं किए गए तो गिरफ्तारी पर मिली राहत स्वतः समाप्त हो जाएगी।

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मामला बिलासपुर के राजकिशोर नगर निवासी अंकुर गौराहा, उनके पिता राकेश गौराहा और माता रेखा गौराहा से जुड़ा है। तीनों के खिलाफ अंकुर की पत्नी भाव्या गौराहा ने सारंगढ़ थाना में दहेज प्रताड़ना और उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था। एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कार्रवाई पर रोक लगाने और एफआईआर निरस्त करने की मांग की थी।

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि शिकायत में लगाए गए आरोप तथ्यहीन और दुर्भावनापूर्ण हैं। उनका दावा था कि एफआईआर काफी विलंब से दर्ज कराई गई तथा उसमें दहेज मांगने या क्रूरता से संबंधित ठोस तथ्यों का अभाव है।

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी पति अंकुर गौराहा को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के मीडिएशन सेंटर में एक लाख रुपये जमा करे। अदालत ने कहा कि इस शर्त के पूरा होने पर ही 29 जून 2026 तक गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक प्रभावी रहेगी। यदि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं की गई तो यह राहत स्वतः समाप्त मानी जाएगी।

अदालत ने यह भी माना कि मामला पारिवारिक और वैवाहिक विवाद से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे आपसी सहमति और मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से पति-पत्नी दोनों को 8 जून 2026 को हाईकोर्ट के मीडिएशन सेंटर में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं।

कोर्ट ने कहा कि एक लाख रुपये जमा करने के बाद उसकी रसीद संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि भविष्य में दोनों पक्षों के बीच अंतिम समझौता हो जाता है तो जमा की गई राशि को उस समझौते का हिस्सा माना जा सकता है।

हाईकोर्ट के इस आदेश को दहेज प्रताड़ना के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जहां एक ओर आरोपियों को सीमित राहत दी गई है तो दूसरी ओर विवाद के समाधान के लिए मध्यस्थता की राह भी खुली रखी गई है।