भगवान् के घर में खेला: करोडो की जमीन मात्र 2500 में बिकी, 50 साल बाद सामने आया खरीददार.. मंदिर ट्रस्ट की आपत्ति ख़ारिज।

स्वतंत्र बोल
रायपुर 12 फरवरी 2025.  प्रदेश के मठ-मंदिरो के जमीनों की खरीदी-बिक्री के विवादों के बीच राजधानी के प्राचीन मठ की जमीन फिर बिक गई। मठ की साढ़े 17 एकड़ जमीन मात्र 2500 रुपये में बिकी है। सुनने में आश्चर्य हो सकता है, पर सच यही है।  स्वतंत्र बोल के पास मौजूद दस्तावेजो के अनुसार करोडो की जमीन कौड़ियों के भाव बिकी है।

 

 

परंपरा गार्डन के संचालक बोले- हमने किसान से खरीदी जमीन, एडीएम को जाँच का अधिकार नहीं.. उधर एसडीएम ने महंत रामभूषण दास को बताया अवैध।

राजधानी के प्राचीन रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ के जमीन को साल 1972 में कलेक्टर की अनुमति के बाद तत्कालीन महंत ने दतरेंगा के एक किसान को कथित तौर पर बेचा था। पंजीकृत बैनामा अनुसार साढ़े 17 एकड़ जमीन को कुल 2500 रुपये में बेचा गया था, जिसमे विक्रेता ने महंत को सिर्फ 500 रुपये दिया और शेष राशि 2000 रुपये खरीदी के 40 सालो बाद भी नहीं दिया था। साल 2007 में विक्रेता किसान की मौत के बाद उसके बेटे-बेटियों ने तहसीलदार कोर्ट में जमीन का नामांतरण कराने आवेदन किया। आवेदकों ने कोर्ट में कहा कि

”उनके पिता ने साल 1972 में जमीन महंत लक्ष्मी नारायण दास से खरीदा था, खरीदी की शर्ते क्या थी, कितनी में खरीदी और रजिस्ट्री कब हुई और बदले में क्रेता महंत को कितनी राशि दी गई उन्हें नहीं पता, उस जमीन का अब तक नामांतरण नहीं हुआ है। कृपया नामांतरण करे।”

ट्रस्ट ने कहा- नहीं बिकी जमीन, बैनामा अवैध..


भगवान की जमीन मे बडा खेला हुआ है। मंदिर ट्रस्ट को जमीन बिकने की जानकारी दैनिक समाचार पत्रों में जारी हुए इश्तहार से हुआ। मठ प्रबंधन ने आपत्ति करते हुए बैनामा को अवैध बताया और कहा कि “वर्षो तक जमीन का नामांतरण नहीं हुआ, आज भी जमीन स्वामी रामचंद्र जैतूसाव मठ के नाम पर है… जिसे रेघ पर किसानो द्वारा फसले ली जारी है। दिसंबर 1981 को तत्कालीन अतिरिक्त जिलाध्यक्ष तिवारी की अध्यक्षता में न्यास समिति की बैठक में दतरेंगा की उक्त खसरा के साढ़े 17 एकड़ जमीनों को बेचने का प्रस्ताव था कि अगली बैठक में सौदो को मंजूरी दी जाएगी। मतलब साल 1081 तक उक्त खसरो की भूमि को बेचने कलेक्टर द्वारा अनुमति नहीं दी गई थी। जमीन खरीदी के 50 वर्षो बाद भी जमीन का नामांतरण नहीं किया गया ना ही शेष राशि का भुगतान किया गया।

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तहसीलदार ने कर दिया आदेश-


किसानो के आवेदन पर मठ प्रबंधन की आपत्ति और तमाम दावों को दरकिनार करते हुए तत्कालीन तहसीलदार ने  50 साल बाद जमीन का नामान्तरण करने आदेशित कर दिया। जबकि मंदिर प्रबंधन ने साल 1972 में पंजीकृत बैनामा को निरस्त करने व्यवहार न्यायालय में अपील भी किया, जो वर्तमान में पेंडिग है। मामला कोर्ट में पेंडिंग होने के बाद भी तहसीलदार ने आनन फानन में यह कहते हुए नामान्तरण कर दिया कि

“पंजीकृत बैनामा को निरस्त करने का अधिकार राजस्व न्यायालय को नहीं है, पंजीकृत विक्रय विलेख को निरस्त करने का सिविल कोर्ट में की जा सकती है.. राजस्व न्यायलय में नहीं। पंजीकृत बैनामा पर किसी भी प्रकार का हस्त्क्षेप करने का अधिकार राजस्व न्यायालय को नहीं है।”

रिकॉर्ड रूम में रिकॉर्ड नहीं-
मठ प्रबंधन ने आपत्ति करर्ते हुए पंजीकृत बैनामा को फर्जी और अवैध बताया तो तहसीलदार द्वारा बैनामा की जानकारी रजिस्टार से मांगी गई तो पता चला की साल 1972 में पंजीकृत बैनामा का रिकॉर्ड उप पंजीयक कार्यालय के अपने उचित स्थान में नहीं है। उसके बाद भी तहसीलदार ने इसकी जाँच का आदेश करने की जगह नामान्तरण का आदेश कर दिया।

एसडीएम बोले- सही हुआ
मठ प्रबंधन ने तहसीलदार के आदेशो से खिन्न होकर तहसीलदार पर पक्षपात और नियमो का पालन नहीं करने शिकायत कलेक्टर से की.. पर मठ प्रबंधन को वह भी निराशा ही मिली। तहसीलदार केा आदेशो को एसडीएम कोर्ट और पंजीयक सार्वजनिक न्यास कोर्ट में अपील की। एसडीएम कोर्ट ने तहसीलदार के आदेशों को यथावत रखते हुए अपील को ख़ारिज कर दिया।

दरअसल भूमाफियाओ की नजर मठ मंदिरो की बेशकीमती जमीनों पर है, जो फर्जी पेपर्स तैयार कर मनमाने तरीके से भगवान् की जमीनों का सौदा कर रहे है। भूमाफियाओ का संगठित गिरोह लगातार जैतूसाव मठ सहित अन्य मठ मंदिरो की जमीनों को राजस्व अधिकारीयो से मिलीभगत कर हड़पने और बेचने में लगा हुआ है। एसडीएम को मिला फ्लैट भी शायद उसी का हिस्सा है।

 

मठ की जमीनों का खेला: ट्रांसफर के बाद तहसीलदार ने किया नामांतरण, उधर दतरेंगा की जमीन पर बिल्डर की नजर।