गणेश उत्सव खत्म होते ही पितृपक्ष की शुरुआत हो जाती है और इसके बाद नवरात्रि, दशहरा और फिर दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर पितृपक्ष त्योहारों के बीच ही क्यों आता है? क्या यह सिर्फ संयोग है या इसके पीछे पंचांग और धार्मिक परंपरा की कोई वजह है? इसका सीधा संबंध हिंदू चंद्र पंचांग से है। पितृपक्ष हर साल एक निश्चित समय पर नहीं, बल्कि भाद्रपद पूर्णिमा के बाद आने वाले कृष्ण पक्ष में पड़ता है। इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की शुरुआत के साथ नवरात्रि का समय आता है।
पितृपक्ष कब आता है?
पितृपक्ष को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह आमतौर पर भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक का समय होता है। इस दौरान कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। पितृपक्ष की अंतिम तिथि को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके तुरंत बाद शारदीय नवरात्रि का आरंभ होता है। यही वजह है कि कैलेंडर में पितृपक्ष और नवरात्रि एक-दूसरे के काफी करीब दिखाई देते हैं।
त्योहारों के बीच ही क्यों पड़ता है?
दरअसल, हिंदू धर्म के ज्यादातर बड़े त्योहार चंद्रमा की गति और तिथियों पर आधारित होते हैं। चंद्रमा के आधार पर महीने और पक्ष तय होते हैं। इसलिए त्योहारों की तारीख हर साल अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से बदलती रहती है। गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आती है। इसके बाद पूर्णिमा होती है और फिर कृष्ण पक्ष शुरू होता है। यही कृष्ण पक्ष पितरों को समर्पित माना जाता है। पितृपक्ष की समाप्ति के बाद आश्विन शुक्ल पक्ष शुरू होता है। इसी पक्ष में शारदीय नवरात्रि आती है। नवरात्रि के बाद दशहरा और आगे चलकर दीपावली का पर्व आता है। यानी पितृपक्ष को त्योहारों के बीच अलग से रखा गया कोई समय नहीं है। यह हिंदू पंचांग में चंद्र पक्षों के क्रम का हिस्सा है।
गणेश उत्सव के बाद ही क्यों?
गणेश उत्सव भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता है। इसके बाद भाद्रपद पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष शुरू होता है। इसी कृष्ण पक्ष में पितृपक्ष मनाया जाता है। इसलिए कई जगहों पर गणेश उत्सव के कुछ दिनों बाद ही श्राद्ध पक्ष शुरू होता दिखाई देता है। इसे ऐसे समझें
गणेश चतुर्थी → भाद्रपद शुक्ल पक्ष → भाद्रपद पूर्णिमा → पितृपक्ष/कृष्ण पक्ष → सर्वपितृ अमावस्या → शारदीय नवरात्रि → दशहरा → दीपावली
पितृपक्ष के बाद नवरात्रि क्यों?
पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। सर्वपितृ अमावस्या के साथ यह पक्ष समाप्त होता है।इसके अगले पक्ष में शारदीय नवरात्रि आती है। धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि को देवी उपासना का प्रमुख समय माना जाता है। इस तरह पंचांग में पहले पितरों के स्मरण और फिर देवी उपासना का क्रम आता है।
क्या पितृपक्ष अशुभ होता है?
पितृपक्ष को केवल अशुभ समय मानना सही नहीं है। धार्मिक परंपरा में इसे पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्मरण का समय माना गया है। हालांकि, कई परिवारों और परंपराओं में इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश और कुछ अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। यह मान्यता अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है।
पितृपक्ष के बाद त्योहारों का सिलसिला क्यों बढ़ जाता है?
सर्वपितृ अमावस्या के बाद शारदीय नवरात्रि शुरू होती है। इसके बाद दशहरा आता है। फिर करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज जैसे प्रमुख पर्व आते हैं। इसलिए कैलेंडर में यह पूरा समय लगातार त्योहारों से भरा हुआ दिखाई देता है। असल में यहां कोई विरोधाभास नहीं है। पितृपक्ष और त्योहारों का यह क्रम हिंदू चंद्र पंचांग में तिथियों और पक्षों के अनुसार तय होता है।
एक लाइन में समझें
पितृपक्ष त्योहारों के बीच इसलिए आता है क्योंकि यह भाद्रपद पूर्णिमा के बाद आने वाले कृष्ण पक्ष में पड़ता है। इसके तुरंत बाद आश्विन शुक्ल पक्ष शुरू होता है, जिसमें नवरात्रि और आगे दशहरा-दीपावली जैसे पर्व आते हैं। यानी पितृपक्ष का त्योहारों के बीच आना संयोग नहीं, बल्कि हिंदू पंचांग में चंद्र पक्षों के क्रम का परिणाम है।


