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रायपुर 13 अक्टूबर 2026: शारदीय नवरात्रि में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दौरान दो से दस वर्ष तक की कन्याओं को मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों के रूप में पूजने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर उम्र की कन्या का एक विशेष नाम और महत्व बताया गया है। कन्या पूजन में नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है, जिसे लांगुरिया या लांगूर कहा जाता है। उसे भैरव बाबा का स्वरूप माना जाता है।
अष्टमी-नवमी पर कब करें कन्या पूजन?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी या नवमी तिथि पर सूर्योदय के बाद कन्या पूजन करना शुभ माना जाता है। चौघड़िया के अनुसार शुभ, लाभ या अमृत मुहूर्त में पूजा करने की परंपरा है।
दी गई जानकारी के मुताबिक, सुबह 6:30 से 10:30 बजे के बीच का समय कन्या पूजन के लिए उत्तम माना गया है। पूजा का समय तय करते समय स्थानीय पंचांग में तिथि, चौघड़िया और राहुकाल देखना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राहुकाल में पूजा करने से बचने की सलाह दी जाती है।
कन्या पूजन में लांगुरिया का क्या महत्व है?
कन्या पूजन के दौरान नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाने की परंपरा है। इस बालक को लांगुरिया या लांगूर कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, उसे भैरव बाबा का स्वरूप माना जाता है। भैरव बाबा को मां दुर्गा का रक्षक बताया गया है।
इसी मान्यता के चलते कन्याओं के साथ बालक का भी पूजन किया जाता है।
कन्या पूजन की सही विधि क्या है?
कन्या पूजन के दौरान बच्चियों का सम्मान और सत्कार करना महत्वपूर्ण माना जाता है। पूजा की परंपरागत विधि इस प्रकार है:
- आदरपूर्वक आमंत्रण: सबसे पहले कन्याओं को सम्मान के साथ घर पर आमंत्रित करें।
- चरण प्रक्षालन: स्वच्छ जल या दूध से उनके पैर धोने की परंपरा है। इसके बाद उन्हें साफ आसन पर बैठाएं।
- तिलक और मौली: माथे पर कुमकुम, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं। हाथों में मौली बांधें।
- भोग और भोजन: कन्याओं को पूरी, हलवा और काले चने श्रद्धापूर्वक परोसें।
- चुनरी और दक्षिणा: भोजन के बाद लाल चुनरी, फल, श्रृंगार सामग्री और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा भेंट करें।
- आशीर्वाद: अंत में कन्याओं के प्रति सम्मान प्रकट करें और आशीर्वाद लें।
किस उम्र की कन्या को किस स्वरूप में पूजते हैं?
धार्मिक मान्यताओं में दो से दस वर्ष तक की कन्याओं के अलग-अलग नाम बताए गए हैं। हर स्वरूप से जुड़ा एक विशेष फल भी माना जाता है।
2 वर्ष की कन्या: कुमारी
दो वर्ष की कन्या को कुमारी स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि इनके पूजन से घर में सुख-शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
3 वर्ष की कन्या: त्रिमूर्ति
तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनके पूजन से परिवार में सुख-समृद्धि और वैभव प्राप्त होता है।
4 वर्ष की कन्या: कल्याणी
चार वर्ष की कन्या को कल्याणी स्वरूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इनके पूजन से कार्यों में सफलता और पारिवारिक सुख मिलता है।
5 वर्ष की कन्या: रोहिणी
पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनके पूजन से उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है।
6 वर्ष की कन्या: कालिका
छह वर्ष की कन्या को कालिका स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि इनके पूजन से विद्या, बुद्धि और यश की प्राप्ति होती है।
7 वर्ष की कन्या: चंडिका
सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनके पूजन से ऐश्वर्य और धन की प्राप्ति होती है।
8 वर्ष की कन्या: शाम्भवी
आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी स्वरूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इनके पूजन से मान-सम्मान मिलता है और वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है।
9 वर्ष की कन्या: दुर्गा
नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इनके पूजन से शत्रुओं पर विजय और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
10 वर्ष की कन्या: सुभद्रा
दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहा जाता है। मान्यता है कि इनके पूजन से संकट दूर होते हैं और भक्त की इच्छाएं पूरी होती हैं।
कन्या पूजन के दौरान इन धार्मिक परंपराओं के साथ बच्चियों के प्रति सम्मान, स्नेह और आदर का भाव रखना भी महत्वपूर्ण है।


