जैतूसाव मठ: घटता रकबा और गिरती गई साख, करोडो की सम्पत्ति पर नजर.. क्या पुण्य आत्माये दुखी नहीं होगी ?

स्वतंत्र बोल
रायपुर 16 फरवरी 2025.  सार्वजनिक न्यास अधिनियम अंतर्गत प्रदेश में मठ मंदिरो की कृषि और गैर कृषि भूमि की बिक्री पर पूर्णतः रोक है। विशेष परिस्थिति में मंदिर या मठ प्रबंधन जिला कलेक्टर की अनुमति के बाद ही जमीन को बेच सकते है। छत्तीसगढ़ के प्राचीन ठाकुर रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ की साढ़े 17 एकड़ जमीन बिल्डर और राजस्व अधिकारियो की मिलीभगत से एक बार फिर बिक गई। मठ प्रबंधन ने पहले आपत्ति की फिर बाद में लाखो रुपये लेकर गुप्त समझौता कर लिया। मंदिर ट्रस्ट प्रबंधन की ऐसे समझौते को देखकर मठ की नीव रखने वाली स्वर्गीय उमा देवी और गुरुबिहारी लाल वैष्णव की पुण्य आत्माये जरूर आहत हुई होगी।

स्वतंत्र बोल “पड़ताल”: मंदिर ट्रस्ट की जमीन बिल्डर ने ख़रीदा, मंदिर प्रबंधन ने पहले आपत्ति की.. फिर गुपचुप समझौता किया !

दतरेंगा की जिस साढ़े 17 एकड़ जमीन पर किसान परिवार ने अपना दावा किया वो मंदिर प्रबंधन के दस्तावेजों के अनुसार उसकी बिक्री हेतु अनुमति कलेक्टर ने कभी नहीं दिया , पर राजस्व न्यायलय के फैसले के बाद जमीन किसान को चली गई। ऐसे में मंदिर प्रबंधन ने कलेक्टर को शिकायत करने या उचित फोरम में अपील करने की जगह किसान परिवार से समझौता कर लिया और जमीन से कब्ज़ा मुक्त करने के बदले 62 लाख रुपये दिए गए, तो क्या मठ प्रबंधन ने सिर्फ पैसो के लिए आपत्ति दर्ज कराया था ?

घटता रकबा, गिरती साख-


जैतूसाव मठ की स्थापना वर्ष 1882 में श्रीमती उमाबाई जैतूसाव ने किया था, तब मठ में करीब 14 गाँवो की 3000 एकड़ से अधिक जमीने थी। बाद में दान की गई जमीनों का हिस्सा बटवारा होने से गाँव और जमीने आधी रह गई और साल 1972 के बाद से रकबा घटते गया। साल 1987 में महंत लक्ष्मीनारायण दास की मृत्यु के बाद से मठ की जमीने तेजी कौड़ियों के भाव से बिकी। तेजी से सार्वजनिक न्यास जैतूसाव मठ का रकबा घटा और साख गिरती गई। वर्तमान में भी मठ की सम्पत्ति को लेकर ही अनेक तरह के विवाद है।

दिग्गज पदाधिकारी ट्रस्ट में-


ठाकुर रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ में मौजूदा समय में कलेक्टर पदेन प्रबंधक है, तो राजे श्री महंत रामसुंदर दास सर्ववराकार है। पूर्व विधायक सत्यनारायण शर्मा उपाध्यक्ष, महेंद्र अग्रवाल सचिव, अजय तिवारी, सुरेश शुक्ला सहित अन्य ट्रस्टी है। उसके बाद आखिर ऐसी स्थिति कैसे निर्मित हो गई। मंदिर प्रबंधन के जिम्मेदारों के अनुसार “सिविल कोर्ट से लेकर राजस्व मंडल तक में हमें निराशा हाथ लगी, कोर्ट कचहरी करने पैसा भी लगता है। मंदिर की जमीन मात्र 500 रुपये में जाने देने के बाद समझौता करना बेहतर समझा।”

 

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