नक्सल साए में उजड़े 667 गांव… 31 हजार लोगों की वापसी से पहले क्या फिर जागेगा बस्तर का डर?

स्वतंत्र बोल 
रायपुर,03 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से जुड़ी एक बड़ी और संवेदनशील कहानी अब नए मोड़ पर पहुंच चुकी है। कभी नक्सलियों के खौफ से वीरान हुए 667 गांवों में अब फिर से जिंदगी बसाने की तैयारी शुरू हो गई है। सरकार 31 हजार से ज्यादा आदिवासियों की घर वापसी की योजना पर तेजी से काम कर रही है—लेकिन इस फैसले के साथ कई अनसुलझे सवाल भी सामने खड़े हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, नक्सली हिंसा और लगातार डर के माहौल ने 667 गांवों के 31 हजार से अधिक ग्रामीणों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। ये लोग तेलंगाना और आंध्रप्रदेश की ओर पलायन कर गए थे। इन विस्थापितों में कुल 6939 परिवार शामिल हैं, जिनमें दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित जिले रहे।

अब राज्य सरकार इन परिवारों को उनके मूल गांवों में वापस बसाने के लिए व्यापक योजना बना रही है। इस योजना के तहत उन्हें सुरक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया जा रहा है, ताकि वे फिर से सामान्य जीवन जी सकें। लेकिन जिन गांवों को कभी नक्सलियों के डर ने उजाड़ दिया था, वहां दोबारा बसना क्या इतना आसान होगा—यह सवाल अब भी बना हुआ है।

इसी बीच इस पूरे मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई है। डिप्टी सीएम अरुण साव ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि पिछली सरकार कभी नहीं चाहती थी कि प्रदेश से नक्सलवाद खत्म हो। उन्होंने कहा कि उस दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथ बांध दिए गए थे, जिससे नक्सलियों का मनोबल बढ़ा।

अरुण साव ने यह भी दावा किया कि मौजूदा सरकार के सख्त अभियान और नीतियों के चलते नक्सलवाद पर काफी हद तक काबू पाया गया है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों के सरेंडर करने पर उन्हें बेहतर पुनर्वास दिया जा रहा है और आम लोगों तक सरकारी योजनाओं को तेजी से पहुंचाया जा रहा है। हाल ही में एक बड़े नक्सली कमांडर के आत्मसमर्पण को उन्होंने सरकार की सरेंडर पॉलिसी का असर बताया और विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह निराधार करार दिया।

हालांकि, बस्तर के जंगलों में बीते वर्षों की खामोशी के पीछे छिपे डर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिन लोगों ने कभी रातों-रात अपने घर छोड़े थे, उनके लिए वापसी सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि एक बड़ा जोखिम भी है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह घर वापसी बस्तर में शांति की नई शुरुआत बनेगी या फिर कहीं अतीत का खौफ दोबारा सिर उठाएगा।