वकील नहीं मिला तो खुद बन गए अपने केस के पैरोकार! शिक्षक की दलीलों से हाईकोर्ट भी हुआ प्रभावित, फिर आया बड़ा आदेश

स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 05 जून 2026:  आमतौर पर अदालत में अपनी बात रखने के लिए लोग वकीलों की मदद लेते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के एक शिक्षक ने अपनी पारिवारिक परेशानियों और बच्चों के भविष्य की चिंता को लेकर ऐसा कदम उठाया, जिसने न्यायालय का भी ध्यान खींच लिया। उन्होंने न सिर्फ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, बल्कि पूरे मामले की पैरवी भी खुद की। आखिरकार उनकी दलीलों पर सुनवाई हुई और कोर्ट से उन्हें बड़ी राहत मिल गई।

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मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के हाई स्कूल मरकेली में पदस्थ व्याख्याता गया राम दुबे ने किसी अधिवक्ता की सहायता लेने के बजाय स्वयं न्यायालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे भिलाई में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं और परिवार में उनकी देखभाल करने वाला कोई अन्य सदस्य नहीं है।

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150 किलोमीटर की दूरी बनी बड़ी परेशानी

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि उनकी वर्तमान पदस्थापना मरकेली में है, जबकि उनके बच्चे भिलाई में रहते हैं। दोनों स्थानों के बीच करीब 150 किलोमीटर की दूरी है, जिसके कारण उन्हें लगातार पारिवारिक और व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने न्यायालय को यह भी बताया कि जून 2025 में उनका स्थानांतरण बालोद जिले के कुमुदकट्टा से मरकेली किया गया था। लगभग एक वर्ष तक वहां सेवाएं देने के बाद उन्होंने 1 अप्रैल 2026 को दुर्ग संभाग के संयुक्त संचालक, स्कूल शिक्षा को आवेदन देकर बालोद या दुर्ग जिले में स्थानांतरण की मांग की थी।

आवेदन दिया, लेकिन विभाग ने नहीं लिया फैसला

व्याख्याता का आरोप था कि आवेदन दिए जाने के बाद भी विभाग ने उस पर कोई निर्णय नहीं लिया। मामला लंबे समय तक लंबित रहने पर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली और स्वयं अपना पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से भी इस बात का विरोध नहीं किया गया कि आवेदन पर विचार किया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा- अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते आवेदन

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने कहा कि जब याचिकाकर्ता का आवेदन विभाग के समक्ष लंबित है, तो उसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

कोर्ट ने दुर्ग संभाग के संयुक्त संचालक, स्कूल शिक्षा को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर कानून के अनुसार विचार करते हुए 45 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए।

खुद रखी दलील, मिली राहत

इस मामले की सबसे खास बात यह रही कि शिक्षक ने बिना किसी वकील की सहायता के स्वयं अदालत में अपनी बात रखी और अपनी पारिवारिक परिस्थितियों को विस्तार से बताया। कोर्ट ने उनकी स्थिति को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग को तय समयसीमा में निर्णय लेने का आदेश दिया और याचिका का निपटारा कर दिया।

यह मामला उन लोगों के लिए भी मिसाल बन गया है जो अपनी समस्याओं को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया को लेकर संकोच महसूस करते हैं।