स्वतंत्र बोल
रायपुर, 17 अप्रैल 2026: देश की राजनीति और सामाजिक संरचना में एक बड़ा बदलाव दस्तक दे चुका है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लागू होने के साथ अब महिलाओं की भूमिका सिर्फ सहभागिता तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी मजबूत उपस्थिति तय मानी जा रही है। छत्तीसगढ़ में इस अधिनियम को लेकर जिस तरह का माहौल बन रहा है, वह आने वाले समय में एक बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है।
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भारत की संस्कृति में नारी को हमेशा शक्ति और सृजन का प्रतीक माना गया है, लेकिन इतिहास के कई दौर ऐसे भी रहे जब महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। अब यह अधिनियम उस असंतुलन को सुधारने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला यह अधिनियम केवल एक संवैधानिक बदलाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में बड़ा प्रयास है। इसके जरिए महिलाओं को नीतियों और निर्णयों में सीधी भागीदारी मिलेगी, जो लंबे समय से अपेक्षित थी।
छत्तीसगढ़ में इस अधिनियम को लेकर सरकार सक्रिय नजर आ रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी जा रही है। राज्य में पहले ही स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण के जरिए महिलाओं की भागीदारी को मजबूत किया जा चुका है, जिसका असर पंचायतों और नगरीय निकायों में स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।
सरकार ने इस वर्ष को “महतारी गौरव वर्ष” के रूप में मनाने का निर्णय लेकर भी स्पष्ट संकेत दिया है कि महिलाओं के सम्मान और अधिकार को लेकर उसकी प्रतिबद्धता कितनी गंभीर है। महतारी वंदन योजना जैसी पहलें पहले ही महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में काम कर रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लागू होने के बाद न केवल महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, बल्कि नीति निर्माण में उनकी सोच और अनुभव का भी प्रभाव देखने को मिलेगा। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर अधिक संवेदनशील और प्रभावी निर्णय लिए जा सकेंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह अधिनियम वास्तव में जमीनी स्तर पर बदलाव ला पाएगा या फिर यह भी कागजों तक सीमित रह जाएगा। फिलहाल, छत्तीसगढ़ में इसे लेकर जो उत्साह और उम्मीद दिखाई दे रही है, वह इस बात का संकेत जरूर देती है कि बदलाव की नींव रखी जा चुकी है।
