राहुल गोस्वामी @स्वतंत्र बोल
रायपुर 23 अप्रैल 2025. राजधानी रायपुर के पुरानी बस्ती क्षेत्र में स्थित जैतूसाव मठ का इतिहास काफी पुराना है, इसका निर्माण वर्ष 1887 में स्वर्गिय उमाबाई जैतूसाव ने किया था। यहाँ भगवान् सीता, राम और लक्षमण की पूजा होती है। आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का ठिकाना हुआ करता था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यहाँ बैठकर योजनाएं बनाया करते थे। छत्तीसगढ़ के गाँधी के नाम से लोकप्रिय रहे पंडित सुंदरलाल शर्मा लंबा समय मठ में बिताया था, साल 1933 में जब महात्मा गाँधी रायपुर आये थे तो वे भी जैतूसाव मठ में ठहरे थे और लोगो को आजादी का पाठ पढ़ाया था। प्राचीन जैतूसाव मठ का समृद्धशाली इतिहास है तो अनेक विवादित किस्से है। मठ की संपत्ति को लेकर इन दिनों विवाद गहराया है, जिसे स्वतंत्र बोल सिलसिलेवार पाठकों तक पहुंचाएगा। पहली कड़ी में मठ का इतिहास जानिए:
14 गाँवो की सम्पत्ति दान की-
मंदिर प्रबंधन के अनुसार 1887 में उमा बाई जैतु साव ने मठ की स्थापना की। मंदिर की व्यवस्था बनाने के उदेश्य से उन्होंने अपनी 14 गाँवो की करीब 1200 एकड़ सम्पत्ति को भगवान श्रीराम चंद्र स्वामी को दान कर दिया था। मंदिर को दान की गई जमीन से होने वाले आय से भगवान् के भोग राग और मंदिर का प्रबंधन होता था। बताते है कि दानदाता स्वर्गीय उमा बाई जैतूसाव की मृत्यु के बाद उनकी बेटियों यशोदा बाई और सोना बाई ने भगवान् को दान की गई सम्पत्ति का को वापस मांगा, तब भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वामी और दोनों बेटियों के बीच सम्पत्ति का बराबर हिस्सा बटवारा हुआ था। जिसमे 7 गाँव की जमीन दोनों बेटियों को मिली और 7 गांव भगवान के हिस्से में आया। इन 7 गांवों के जमीनों पर खेती होती है, जिससे होने वाले आय से मंदिर का खर्च चलता है।
मठ के पहले महंत बिहारीदास –
वर्ष 1887 में स्वर्गीय उमा बाई जैतूसाव द्वारा स्थापित किये गए मठ में साल 1897 में पहले महंत एवं सर्वराकार गुरु बिहारीदास गुरु सुन्दरदास को बनाया गया था। उनके सहयोग और मठ के सम्पत्ति की सुरक्षा पंच कमेटी बनाया गया था जिसमे रायपुर के प्रतिष्ठित लोग शामिल थे। साल 1916 में उनकी मौत के बाद उनके शिष्य रहे महंत लक्ष्मी नारायण दास को उनका उत्तरधिकारी और मठ का सर्वकारकर नियुक्त किया गया, पर व्यवस्था के लिए मठ का अध्यक्ष जिला कलेक्टर को बनाया गया। मंदिर के रखरखाव, और भगवान् के भोग राग और सम्पति के सुरक्षा की जिम्मेदारी कलेक्टर की होती थी। कलेक्टर ही प्रत्येक महीने एकमुश्त राशि मंदिर खर्च के लिए जारी करते थे, और तब से आज तक कलेक्टर ही ट्रस्ट के पदेन अध्यक्ष होते है। साल 1987 में महंत लक्ष्मी नारायण दास की मृत्यु के बाद उनके शिष्य रहे महंत रामभूषण दास को महंत बनाया गया। महंत रामभूषण दास की मौत साल 2007 में हुई।
महंत नियुक्ति में सिरफुट्टोवल-

महंत रामभूषण दास की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी के चुनाव में हंगामा हुआ था, मठ के भीतर जमकर हाथापाई हुई थी। जानकार तो यह भी कहते है कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को सुधारने इलाहबाद से गुंडे बुलाये थे। दरअसल महंत रामभूषण दास के मृत्यु के बाद उनके भांजे आशीष तिवारी और भतीजे विकास तिवारी ने स्वयं को रामभूषण दास का उत्तराधिकारी बताया। दोनों ने महंत द्वारा लिखा वसीयत भी बतौर साक्ष्य दिखाया पर दूसरे धड़े ने इन्हे महंत स्वीकार करने से इंकार कर दिया। मठ में राजेश्री महंत रामसुंदर दास महंत एवं सर्वराकार, तो उपाध्यक्ष वरिष्ठ कांग्रेस नेता सत्यनारायण शर्मा, महेंद्र अग्रवाल, अजय तिवारी, सुरेश शुक्ल सहित आधा दर्ज से अधिक कारोबारी घराने को लोग है,, जो स्वयं को ट्रस्टी मानते है। उधर आशीष तिवारी ऊर्फ महंत राम आशीष दास और विकार तिवारी उर्फ़ महंत रामविकास दास क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे है।
सत्यनारायण शर्मा ट्रस्टी नहीं-
श्री रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ के दस्तावेजों का अध्यययन करने पर पता चलता है कि सत्यनारायण शर्मा ट्रस्टी नहीं है। मठ प्रबंधन और स्वयं सत्यनारायण शर्मा जैतूसाव मठ के ट्रस्टी और उपाध्यक्ष बताते है पर दस्तावेजों में इसके उलट है। सत्यनारायण शर्मा का नाम पंजीयक सार्वजानिक न्यास पंजी में कभी जुड़ा ही नहीं है, ट्रस्टी नहीं है। साल 1985 में ट्रस्टी रहे घनश्याम तिवारी के मृत्यु के बाद सत्यनारायण शर्मा का नाम जोड़ने की कवायद हुई थी, 11 अगस्त 1985 को ट्रस्ट कमेटी ने श्री शर्मा का नाम ट्रस्ट में जोड़ने का प्रस्ताव पारित कर पंजीयक सार्वजानिक न्यास को भेजा गया पर आज दिनांक तक उनका नाम ट्रस्ट पंजी में नहीं जुड़ा है, जिसका मतलब वे ट्रस्टी नहीं है।
साल 2016 में उन्हें ट्रस्ट में उन्हें प्रमोट करते हुए उपाध्यक्ष बना दिया गया। बताते है कि की सत्यनारायण शर्मा के बिना अनुमति ट्रस्ट में कोई भी बड़ा काम नहीं होता। महंत रामभूषण दास के उत्तराधिकारी होने के दावा करने वाले आशीष तिवारी उर्फ़ महंत राम आशीष दास 2007 के पहले निजी कंपनी में काम करते थे तो उनके भतीजे विकास तिवारी उर्फ़ महंत रामविकास दास वर्तमान में मठ के समीप ही पान दूकान चलते है।
क्यों नहीं जुड़ा नाम-
लोक न्यास अधिनियम 1951 के अनुसार ट्रस्ट में किसी भी व्यक्ति का नाम जोड़ने के लिए विधिवत रूप से प्रक्रिया का पालन करना होता है। ट्रस्ट के मौजूदा सदस्यों के द्वारा प्रस्ताव पारित कर पंजीयक सार्वजानिक न्यास को भेजा जाता है, जो दैनिक समाचार पत्रों में इश्तेहार जारी सम्बंधित व्यक्ति के ट्रस्टी में शामिल करने को लेकर दावा आपत्ती मंगाता है। दूसरी तरफ पुलिस से रिपोर्ट मांगी जाती है,, तब कही जाकर किसी भी व्यक्ति को ट्रस्ट में शामिल किया जाता है। श्री शर्मा के मामले में ऐसा नहीं किया गया। उधर आशीष तिवारी के अनुसार मठ में शामिल होने से पहले वे एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे, उन्हें उनके मामा रामभूषण दास ने के कहने पर मठ में आये थे। तो उनके भतीजे विकास तिवारी मठ के पास ही रहते थे। मठ
अजय तिवारी और महेंद्र अग्रवाल-
जैतूसाव मठ के ट्रस्टी बताये जाने वाले अजय तिवारी का बचपन मठ में ही बिता। उनकी पूरी शिक्षा मठ और उसके सरंक्षण में हुई, मठ प्रबंधन के जिम्मेदारों के अनुसार अजय तिवारी एक साथ दो जगहों में नौकरी करते थे, बाद में उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। वर्तमान में मठ में ही निवासरत है। साल 1987 में महंत लक्ष्मी नारायण दास की मृत्यु के बाद उन सभी संस्थाओ में अजय तिवारी उनके शिष्य बनकर शामिल हो गए जहाँ कभी महंत लक्ष्मी नारायण दास थे। अजय तिवारी ग्राम सेवा समिति, राष्ट्रीय विद्यालय, डागा कॉलेज, संस्कृत विद्यालय सहित आधा दर्जन से अधिक संस्थाओ में पदाधिकारी है। अजय तिवारी ने निजी जीवन को लेकर अनेको चर्चाये है। ट्रस्ट के सचिव बने महेंद्र अग्रवाल एक निजी बैंक में अधिकारी थे, वे उमा बाई जैतूसाव की बेटी यशोदा बाई के पोते है। साल 1982 से ट्रस्ट में जुड़े हुए है, बैंक की नौकरी करते वे ट्रस्टी के लेखा जोखा का हिसाब रखते थे। बैंक से रिटायरमेंट होने के बाद से वे मठ में पूर्ण रूप से काम कर रहे है और वे स्वयं को मठ का सचिव बताते है जबकि लोक न्यास अधिनियम 1951 के अनुसार ट्रस्ट में सचिव का कोई भी पद उल्लेखित नहीं है। यह सही है कि अग्रवाल ने बेहतर तरीके से मठ को सवारने की कोशिश की है।

साल 2007 में महंत रामभूषण दास की मृत्यु के बाद मठ में नया महंत बनाया जाना था, ऐसे में विवादों के बीच दुग्धाधारी मठ के महंत रामसुंदर दास को मठ का महंत चुना गया। तब से लेकर अब तक वे ही सर्वराकार और महंत बने हुए है।







