स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 21 अप्रैल 2026। दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में सबूतों की अहमियत पर एक बड़ा और निर्णायक फैसला सामने आया है। Chhattisgarh High Court ने साफ कर दिया है कि अगर पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद हो, तो उसी के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है, भले ही मेडिकल या वैज्ञानिक रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में क्यों न हो।
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जस्टिस Ramesh Sinha और Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने सात साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में आरोपी की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
मामला बेमेतरा जिले का है, जहां पीड़ित बच्ची अपने माता-पिता के काम पर बाहर रहने के दौरान गांव में रह रही थी। एक दिन वह पड़ोसी के घर गई और काफी देर तक वापस नहीं लौटी। बाद में जब परिजन उसे लेने पहुंचे, तो वह संदिग्ध हालत में मिली। घर लौटने पर बच्ची ने बताया कि पड़ोसी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
इस घटना के बाद 17 मई 2022 को मामला दर्ज किया गया और पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376 और POCSO Act के तहत कार्रवाई की। जांच के दौरान मेडिकल परीक्षण और डीएनए रिपोर्ट में स्पष्ट सबूत नहीं मिले, जिससे आरोपी को राहत मिलने की उम्मीद थी।
इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों को विश्वसनीय मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए खुद को निर्दोष बताया और दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है। उसने यह भी दलील दी कि वह गूंगा-बहरा और अशिक्षित है, इसलिए कानूनी प्रक्रिया को समझ नहीं पाया।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक साक्ष्य केवल सहायक होते हैं, जबकि प्रत्यक्ष और भरोसेमंद गवाही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि पीड़िता का बयान इस मामले में पूरी तरह सुसंगत और विश्वसनीय है, इसलिए सजा को बरकरार रखना ही न्यायसंगत है।
यह फैसला न केवल इस मामले में न्याय की पुष्टि करता है, बल्कि ऐसे मामलों में पीड़ितों की गवाही की ताकत को भी मजबूती से स्थापित करता है।
