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धर्म डेस्क 7 अक्टूबर 2026: पितृपक्ष में हर तिथि का अलग महत्व माना जाता है। इसी क्रम में द्वादशी तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध ‘द्वादशी श्राद्ध’ या ‘बारस श्राद्ध’ कहलाता है। साल 2026 में द्वादशी श्राद्ध बुधवार, 7 अक्टूबर को किया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन द्वादशी तिथि को हुआ हो। इसके अलावा संन्यास ग्रहण करने वाले लोगों के लिए भी इस तिथि को विशेष माना गया है। इसी वजह से इसे ‘संन्यासी श्राद्ध’ भी कहा जाता है।
द्वादशी श्राद्ध को संन्यासी श्राद्ध क्यों कहते हैं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन लोगों ने सांसारिक जीवन का त्याग कर संन्यास ग्रहण किया था, उनके लिए द्वादशी तिथि पर श्राद्ध का विशेष महत्व माना गया है। ऐसे लोगों ने अपना जीवन धर्म, भक्ति और साधना को समर्पित किया होता है। इसी कारण कई जगह द्वादशी श्राद्ध को संन्यासी श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा से जुड़े संन्यासियों और पितरों के लिए इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने की मान्यता है। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान से पितरों को शांति मिलती है।
किन पितरों का किया जाता है द्वादशी श्राद्ध?
द्वादशी श्राद्ध उन मृतक परिजनों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि को हुई हो। पंचांग में शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की द्वादशी तिथि होती है। इसलिए मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध का दिन निर्धारित किया जाता है। पितृपक्ष की द्वादशी तिथि पर पितरों का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। इस दिन पितरों को याद करके उनके नाम से भोजन, दान और अन्य धार्मिक कार्य किए जाते हैं।
भगवान विष्णु का क्या महत्व है?
द्वादशी तिथि का संबंध भगवान विष्णु की उपासना से भी जोड़ा जाता है। इसलिए इस दिन श्राद्ध कर्म के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वादशी श्राद्ध के अवसर पर भगवान विष्णु के नाम का जाप, विष्णुसहस्रनाम का पाठ और यथाशक्ति दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।
द्वादशी श्राद्ध में क्या करें?
इस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनने के बाद पितरों का स्मरण किया जाता है और श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद विधि के अनुसार तर्पण और पिंडदान किया जाता है। ब्राह्मण भोज कराने और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या उपयोगी वस्तुओं का दान करने की भी परंपरा है। वस्त्र, पात्र और अन्न आदि का दान किया जा सकता है।
द्वादशी श्राद्ध 2026 का शुभ मुहूर्त
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:32 बजे तक
- कुतुप मुहूर्त अवधि: 47 मिनट
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:32 बजे से 1:19 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त अवधि: 47 मिनट
- अपराह्न काल: दोपहर 1:19 बजे से 3:40 बजे तक
- अपराह्न काल अवधि: 2 घंटे 21 मिनट
मघा नक्षत्र में द्वादशी श्राद्ध का महत्व
द्वादशी श्राद्ध के दिन मघा नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में मघा नक्षत्र का संबंध पितरों और पूर्वजों से माना जाता है। इसे पूर्वजों की परंपरा और पितृ सम्मान से जोड़ा जाता है। ऐसे में इस नक्षत्र में पितरों का स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म करने का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि मघा नक्षत्र पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और उनके आशीर्वाद को याद करने का अवसर देता है। इसी वजह से द्वादशी श्राद्ध और मघा नक्षत्र का संयोग पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।


