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धर्म डेस्क 30 सितम्बर 2026 : हिंदू धर्म में आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता है। यह अवधि पूर्वजों को समर्पित मानी जाती है। इस दौरान पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करने की परंपरा है। ज्योतिष और शास्त्रों से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के 16 दिन संयम, सादगी और आत्म-स्मरण के लिए माने जाते हैं। इसी वजह से इस दौरान कुछ नई और भौतिक सुख-सुविधाओं से जुड़ी चीजें खरीदने से परहेज करने की मान्यता है।
1. नए कपड़े और सोने-चांदी के गहने
पितृ पक्ष को उत्सव या जश्न के बजाय पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है। इसलिए इस दौरान अपने इस्तेमाल के लिए नए कपड़े, सोने-चांदी के आभूषण और फैशनेबल चीजें खरीदने से बचने की मान्यता है।
हालांकि, पितरों के तर्पण, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान देने के उद्देश्य से वस्त्र खरीदना वर्जित नहीं माना गया है।
2. नई कार, बाइक, घर या जमीन
नई कार, बाइक, घर, दुकान या जमीन की खरीदारी को आमतौर पर नए और शुभ कार्य की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में नए काम या अचल संपत्ति का सौदा करने से बचना चाहिए।
इसी तरह इस अवधि में वाहन खरीदने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है।
3. नई झाड़ू
वास्तु और शास्त्रों से जुड़ी मान्यताओं में झाड़ू का संबंध मां लक्ष्मी से माना गया है। पितृ पक्ष के दौरान नई झाड़ू खरीदकर घर लाने को शुभ नहीं माना जाता।
मान्यता है कि इस अवधि में झाड़ू खरीदने से घर की बरकत प्रभावित हो सकती है और अनचाहे खर्च बढ़ सकते हैं।
4. लोहा और लोहे का सामान
ज्योतिष से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, पितृ कार्य के दौरान लोहे के बर्तनों या धातु के इस्तेमाल और खरीदारी को शुभ नहीं माना जाता है।
इसी वजह से श्राद्ध पक्ष में लोहे या लोहे से बनी नई वस्तुएं घर लाने से बचने की मान्यता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे मानसिक तनाव और परेशानियां बढ़ सकती हैं।
5. इलेक्ट्रॉनिक्स और नया फर्नीचर
टीवी, फ्रिज, सोफा, बेड और घर की सजावट से जुड़ी नई चीजों को भौतिक सुख-सुविधाओं से जोड़ा जाता है। पितृ पक्ष को सादगी का समय माना जाता है। इसलिए इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक सामान और नए फर्नीचर की खरीदारी से भी परहेज करने की मान्यता है।
कब होगा पितृ पक्ष का समापन?
इस वर्ष पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। मान्यता के अनुसार, जिन पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि ज्ञात नहीं होती, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है। ध्यान रखें कि ऊपर बताई गई बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।


