एक अनजाने खेल ने बदली किस्मत… दर्द, डर और आत्म-संदेह के बीच इस युवा एथलीट ने रच दी पदक जीतने की कहानी


स्वतंत्र बोल
रायपुर 01 अप्रैल 2026. कभी जिस खेल के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था, वही खेल उसकी पहचान बन जाएगा, यह शायद खुद बेथलीन माकरी ने भी नहीं सोचा था। शिलांग की इस युवा एथलीट की कहानी किसी रोमांचक संघर्ष से कम नहीं, जहां दर्द, डर और आत्म-संदेह के बीच उसने खुद को साबित कर दिखाया।

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29 दिसंबर को शिलांग स्थित साई के स्पोर्ट्स ट्रेनिंग सेंटर में एक साधारण दिन अचानक बेथलीन के जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। उनके कोच ने उनमें रेस-वॉक एथलीट बनने की क्षमता देखी, जबकि बेथलीन खुद इस इवेंट से लगभग अनजान थीं। इसके बावजूद, उन्हें 2026 की शुरुआत में अपना खेल बदलने का कठिन निर्णय लेना पड़ा।

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अब तक मिडिल और लॉन्ग-डिस्टेंस रनर के तौर पर खेल रही बेथलीन के लिए यह बदलाव आसान नहीं था। खासी ट्राइब से आने वाली इस एथलीट को रेस-वॉक की जटिल तकनीकों से जूझना पड़ा। शुरुआती हफ्तों में शरीर में तेज दर्द, नींद रहित रातें और मन में उठते सवालों ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। कई बार उन्हें खुद पर ही संदेह होने लगा कि क्या उन्होंने सही फैसला लिया है।

लेकिन यहीं से शुरू हुआ असली संघर्ष। कोच और परिवार के लगातार समर्थन ने उन्हें टूटने नहीं दिया। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी और इकलौती बेटी बेथलीन ने हार मानने के बजाय खुद को पूरी तरह इस नए खेल के लिए समर्पित कर दिया।

जगदलपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में जब वह मैदान में उतरीं, तो यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं बल्कि उनके संघर्ष की अंतिम परीक्षा थी। और बुधवार को इस परीक्षा का नतीजा सामने आया, जब बेथलीन ने महिलाओं की रेस-वॉक स्पर्धा में 1:05:18 का समय निकालकर कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

झारखंड की नेहा ज़ालक्सो और ओडिशा की एलीश एक्का के बाद तीसरे स्थान पर रहते हुए बेथलीन ने यह साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और मेहनत के आगे हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है।

पदक जीतने के बाद बेथलीन ने अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच और परिवार को दिया। उन्होंने कहा कि शुरुआती दो हफ्ते बेहद कठिन थे, लेकिन लगातार प्रेरणा ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।

शिलांग कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा बेथलीन को इस बात पर गर्व है कि वह मेघालय की पहली रेस वॉकर हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीता है। उनका मानना है कि यह उपलब्धि राज्य के युवाओं को इस खेल को अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।

यह कहानी सिर्फ एक पदक जीतने की नहीं, बल्कि उस जिद, हिम्मत और विश्वास की है, जिसने एक अनजान रास्ते को जीत की मंजिल में बदल दिया।