वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 22% से बढ़कर 38% पहुंची: गांवों से लेकर शहरों तक बढ़ी भागीदारी, लेकिन वेतन में अभी भी अंतर

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स्वतंत्र बोल
नई दिल्ली 31 अक्टूबर 2026:
भारत में काम करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले 8 सालों के दौरान जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की रिपोर्ट ‘द पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स’ के अनुसार, देश में 2017-18 के दौरान 10.4 करोड़ महिलाएं वर्कफोर्स का हिस्सा थीं, जो बढ़कर 2025 में 20.1 करोड़ हो गई हैं। इस दौरान कुल वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी 22% से बढ़कर 38% तक पहुंच गई है। हालांकि, रोजगार के नए अवसर मिलने के बावजूद महिलाओं के सामने दोहरी जिम्मेदारियों और वेतन के मोर्चे पर अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

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गांवों में सबसे ज्यादा बढ़े रोजगार, कृषि में भागीदारी अधिक

रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 23.7% से बढ़कर 44.9% हो गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 18.2% से बढ़कर 25.9% तक पहुंची है। ग्रामीण महिला कामगारों में से 73.3% महिलाएं खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं, जबकि इस क्षेत्र में पुरुषों की हिस्सेदारी 47.2% दर्ज की गई है। हालांकि, वेतन के मामले में महिलाएं अभी भी पुरुषों के मुकाबले पीछे हैं और अवैतनिक पारिवारिक श्रम में उनकी संख्या बढ़ी है।

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घरेलू कामकाज का भारी बोझ और ‘मी टाइम’ में कमी

रोजगार बढ़ने के बावजूद महिलाओं पर घर और बच्चों की देखभाल का बोझ जस का तस बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, घर और बच्चों की जिम्मेदारी में पुरुषों की भागीदारी नहीं बढ़ी है, जिसके कारण महिलाओं को नौकरी के साथ घरेलू काम भी संभालने पड़ रहे हैं। महिलाएं घरेलू काम में रोज औसतन 464 मिनट देती हैं, जबकि पुरुष 178 मिनट ही देते हैं। महिलाओं का अवैतनिक काम पुरुषों के मुकाबले 4.46 घंटे ज्यादा है। इसके चलते महिलाओं के आराम, नींद और खुद के लिए मिलने वाले समय (‘मी टाइम’) पर गहरा असर पड़ा है। खुद के लिए समय के मामले में पुरुषों और महिलाओं का अंतर 2024 मिनट से बढ़कर 70 मिनट हो गया है। सर्वे में शामिल 60% महिलाओं ने बताया कि बच्चों और घर की जिम्मेदारी उनके रोजगार से बाहर रहने की मुख्य वजह है, जबकि पुरुषों में से केवल 1% ने ही इसे कारण माना।

पंचायतों में बढ़ा महिला नेतृत्व, लेकिन चुनौतियां कायम

एक तरफ जहां आर्थिक मोर्चे पर महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, वहीं राजनीतिक और स्थानीय शासन में भी उनकी भागीदारी मजबूत हुई है। पंचायती राज मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 24 लाख 41 हजार 781 पंचायत प्रतिनिधियों में से 12 लाख 14 हजार 885 (यानी 49.75% लगभग आधी) महिलाएं हैं। महिला नेतृत्व का असर राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कारों में भी साफ दिखाई दिया है। वर्ष 2025 के पुरस्कारों के लिए चुनी गई 48 पंचायतों में से 25 की कमान महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास थी, जिसमें 34 ग्राम पंचायतें और आठ समग्र प्रदर्शन वाली पंचायतें शामिल हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि महिला सरपंच की जगह उनके परिवार के पुरुष सदस्यों (प्रधान पति या परिजनों) द्वारा फैसले लेने की प्रथा स्वायत्त नेतृत्व के सामने एक बड़ी बाधा बनी हुई है। इस समस्या से निपटने के लिए मंत्रालय की समिति ने 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें