स्वतंत्र बोल
रायपुर, 16 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में अब ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में बेचैनी बढ़ा दी है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की ताजा कार्रवाई ने उन फाइलों को खोल दिया है, जिनमें करोड़ों की ‘अदृश्य संपत्ति’ और सत्ता के दुरुपयोग की परतें दबी हुई थीं।
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CBI ने आबकारी विभाग के पूर्व विशेष सचिव और एमडी अरुणपति त्रिपाठी तथा उनकी पत्नी मंजूला त्रिपाठी के खिलाफ FIR दर्ज कर दी है। मामला अनुपातहीन संपत्ति से जुड़ा है, लेकिन जांच एजेंसी के संकेत कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
जांच में सामने आया है कि त्रिपाठी की घोषित संपत्ति महज 38 लाख रुपये से बढ़कर करीब 3.32 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। आरोप है कि यह उछाल सामान्य आय से कहीं ज्यादा है और इसके पीछे पद के दुरुपयोग की भूमिका रही है। CBI की दिल्ली स्थित एंटी करप्शन ब्रांच अब इस पूरे वित्तीय खेल की बारीकी से जांच कर रही है, जिसमें उनकी पत्नी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—क्या यह सिर्फ शुरुआत है? क्योंकि जांच एजेंसी ने संकेत दिए हैं कि यह मामला एक बड़े नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है।
30 से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी रडार पर
CBI की जांच अब एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही। 30 से अधिक अधिकारी और कर्मचारियों की संपत्तियों की भी जांच की जा रही है। एजेंसी वित्तीय लेन-देन, संपत्ति के स्रोत और दस्तावेजों की परत-दर-परत जांच कर रही है। इससे प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में कई और नाम सामने आ सकते हैं, जिससे यह मामला और गहराता नजर आ रहा है।
क्या है पूरा शराब घोटाला?
इस पूरे मामले की जड़ें उस कथित घोटाले से जुड़ी हैं, जिसका जिक्र प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने करीब 3200 करोड़ रुपये का बताया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में एक संगठित सिंडिकेट के जरिए यह खेल रचा गया।
जांच में कुछ प्रमुख नामों का भी उल्लेख हुआ है, जिनमें IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के तत्कालीन एमडी एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर शामिल बताए गए हैं।
घोटाले का ‘तीन लेयर वाला खेल’
जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस कथित घोटाले को तीन हिस्सों—A, B और C—में अंजाम दिया गया।
पहला, डिस्टलरी संचालकों से कमीशन वसूली। बताया गया कि प्रति पेटी तय रकम ली जाती थी और नुकसान की भरपाई के लिए शराब की कीमतों में हेरफेर किया जाता था।
दूसरा, नकली होलोग्राम के जरिए सरकारी दुकानों से अवैध शराब की बिक्री। आरोप है कि अतिरिक्त शराब तैयार कर उसे नकली पहचान के साथ बाजार में उतारा गया और बिक्री का रिकॉर्ड तक छुपाया गया।
तीसरा, सप्लाई जोन में हेरफेर कर अवैध उगाही। टेंडर प्रक्रिया में बदलाव कर अलग-अलग क्षेत्रों में कमीशन आधारित सप्लाई तय की गई, जिससे करोड़ों रुपये की उगाही संभव हुई।
जांच में 40 लाख पेटी से ज्यादा शराब की बिक्री के साक्ष्य मिलने का दावा किया गया है, वहीं देशी शराब सप्लाई के नाम पर करोड़ों रुपये सिंडिकेट तक पहुंचने की बात भी सामने आई है।
अब आगे क्या?
CBI की इस कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि मामला अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि असली कहानी अब सामने आना शुरू हुई है। हर नई जांच के साथ ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जिनके जवाब आने वाले दिनों में बड़े खुलासों का कारण बन सकते हैं।
फिलहाल, सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि अगली कार्रवाई किस पर होती है और इस घोटाले की गहराई आखिर कितनी दूर तक जाती है।
