सारंगढ़ में सजे रहस्यमयी धातु शिल्प, लोगों की उमड़ी भीड़… इन आदिवासी कारीगरों के हुनर ने सबको कर दिया हैरान

स्वतंत्र बोल
रायपुर, 24 मई 2026: छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ में आयोजित एक खास मेले ने इन दिनों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। साहू धर्मशाला में लगे इस जनजातीय हैंडीक्राफ्ट मेले में ऐसी पारंपरिक कलाकृतियां और धातु शिल्प देखने को मिले, जिन्हें देखकर लोग हैरान रह गए। खास बात यह रही कि छोटे से गांव बैगीनडीह के आदिवासी कारीगरों का हुनर मेले का सबसे बड़ा आकर्षण बन गया।

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‘जनजातीय गरिमा उत्सव’ के अंतर्गत आयोजित इस भव्य हस्तनिर्मित वस्तु प्रदर्शनी सह विक्रय मेले का आयोजन ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी ट्राइफेड द्वारा किया गया। मेले में सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के कई जनजातीय कारीगरों ने हिस्सा लिया और अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया।

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मेले में ग्राम बैगीनडीह के शिल्पकारों द्वारा तैयार झारा शिल्प और बेलमेटल यानी घंटी धातु से बने उत्पाद लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। इन कलाकृतियों की बारीक डिजाइन और पारंपरिक शैली ने आगंतुकों को आकर्षित किया। खास बात यह रही कि प्रदर्शनी में शामिल अधिकांश महिला शिल्पकार पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के राष्ट्रीय आजीविका मिशन ‘बिहान’ के अंतर्गत गठित ‘कात्यायनी’ और ‘भारत माता’ स्व-सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं।

ये महिलाएं अब अपने पारंपरिक हुनर को सिर्फ संस्कृति तक सीमित नहीं रख रहीं, बल्कि इसे आजीविका का मजबूत जरिया भी बना रही हैं। स्थानीय स्तर से निकलकर अब इनके उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचने की तैयारी में हैं।

ट्राइफेड के माध्यम से बैगीनडीह जैसे कई शिल्प ग्रामों के कारीगरों को नया मंच मिल रहा है। यह संस्था भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है और आदिवासी समुदायों द्वारा तैयार उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने का काम करती है। संस्था प्राकृतिक शहद, हस्तशिल्प, कपड़े और जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग कर उन्हें बड़े बाजारों तक पहुंचाने में मदद कर रही है।

इसके अलावा ट्राइफेड वनधन माइक्रो उद्यमों को भी तेजी से बढ़ावा दे रहा है। इसके तहत राज्य स्तरीय निर्माता कंपनियों के माध्यम से उत्पादों की प्रोसेसिंग, मूल्य संवर्धन और बेहतर मार्केटिंग पर जोर दिया जा रहा है ताकि आदिवासी समुदायों की आय बढ़ाई जा सके।

मेले में पहुंचे लोगों ने पारंपरिक कला और आदिवासी शिल्प की जमकर सराहना की। कई आगंतुकों ने इसे छत्तीसगढ़ की संस्कृति और जनजातीय विरासत को करीब से देखने का अनोखा अवसर बताया।