’10-15 शब्द और फिर डीजल-डीजल…’ झीरम घाटी कांड में लखमा को आए फोन कॉल्स का क्या है पूरा सच?

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स्वंतत्र बोल
रायपुर 21 सितंबर 2026: 25 मई 2013 के झीरम घाटी हमले की सुनवाई से जुड़े अदालती रिकॉर्ड में नंदकुमार पटेल के वाहन चालक दशाराम सिदार की गवाही में कवासी लखमा के मोबाइल पर आए कई फोन और गोंडी भाषा में हुई बातचीत का जिक्र है। गवाही के मुताबिक, परिवर्तन यात्रा के दौरान लखमा नंदकुमार पटेल के वाहन में सवार थे। रास्ते में उनके मोबाइल पर बार-बार कॉल आए और बातचीत गोंडी में हुई। गवाह ने बातचीत के दौरान ’10-15′ शब्द सुनने की बात कही। इस गवाही में आगे बताया गया कि नंदकुमार पटेल ने लखमा से हिंदी में बात करने और बातचीत का मतलब बताने को कहा। रिकॉर्ड के मुताबिक, लखमा की ओर से इसका जवाब ‘डीजल-डीजल’ बताया गया। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फोन कॉल, गोंडी में बातचीत और ’10-15′ या ‘डीजल-डीजल’ का उल्लेख गवाह के बयान का हिस्सा है। उपलब्ध अदालत के रिकॉर्ड में इसे अपने आप में लखमा की किसी साजिश में भूमिका साबित करने वाला अलग निष्कर्ष नहीं बताया गया है। लखमा इस मामले में घायल गवाह के तौर पर भी अदालत के सामने पेश हुए थे।

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हमले के बाद जंगल की ओर ले जाए गए थे

गवाही के अनुसार, झीरम घाटी में विस्फोट और गोलीबारी के बाद माओवादी नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, वाहन चालक दशाराम सिदार और कवासी लखमा को सड़क से हटाकर जंगल की ओर ले गए थे। रिकॉर्ड में बताया गया कि वहां उनकी पहचान पूछी गई। नंदकुमार पटेल ने खुद को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बताया। इसके बाद उन्हें और उनके बेटे दिनेश को बांध दिया गया। गवाही के मुताबिक, बाद में लखमा और वाहन चालक को वहां से जाने के लिए कहा गया।

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लखमा और माओवादी के बीच गोंडी बातचीत का भी जिक्र

अदालती रिकॉर्ड में घटनास्थल पर कवासी लखमा और माओवादी नेता बताए गए विनोद के बीच गोंडी भाषा में बातचीत का भी उल्लेख है। गवाही के अनुसार, इस बातचीत के बाद घटनास्थल की स्थिति बदली। रिकॉर्ड में दर्ज बयान के मुताबिक, करीब एक घंटे बाद नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल को पीछे से गोली मार दी गई। इसके बाद लखमा और वाहन चालक मोटरसाइकिल से दरभा थाने पहुंचे।

25 मई 2013 को क्या हुआ था?

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला बस्तर की झीरम घाटी से गुजर रहा था। एनआईए के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार शाम करीब 4:15 बजे सीपीआई (माओवादी) के सदस्यों ने काफिले पर हमला किया था। हमले में 27 लोगों की मौत हुई और 38 लोग घायल हुए थे मृतकों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत कई लोग शामिल थे। हमले में सुरक्षा बलों के जवान भी मारे गए थे। एनआईए ने 27 मई 2013 को मामले की जांच अपने हाथ में ली थी। जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किए गए और मामला जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत में चला।

13 साल बाद आया अदालत का फैसला

झीरम घाटी मामले में 5 सितंबर 2026 को विशेष एनआईए अदालत ने मुकदमे का सामना कर रहे 10 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 16 सितंबर को अदालत ने सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। फैसले में 101 गवाहों की गवाही और रिकॉर्ड पर लिए गए दस्तावेजों पर विचार किया गया। अदालत के फैसले के बाद 2013 के हमले से जुड़े कई पुराने बयान और साक्ष्य फिर चर्चा में आए हैं। इनमें दशाराम सिदार की वह गवाही भी शामिल है, जिसमें लखमा के मोबाइल पर आए फोन, गोंडी बातचीत और ’10-15′ शब्दों का उल्लेख है।

गवाही और अदालत के निष्कर्ष में फर्क

झीरम मामले के रिकॉर्ड को समझते समय गवाह के बयान और अदालत के निष्कर्ष को अलग-अलग देखना जरूरी है। किसी गवाह ने किसी घटना, बातचीत या फोन कॉल का जिक्र किया है तो वह उस गवाही का हिस्सा है। उसे किसी व्यक्ति की भूमिका का निर्णायक प्रमाण तभी माना जा सकता है, जब अदालत अपने निष्कर्ष में ऐसा स्थापित करे। लखमा से जुड़े इस प्रसंग में भी उपलब्ध रिकॉर्ड यही अंतर दिखाता है। फोन आने और गोंडी में बातचीत का उल्लेख गवाही में है, लेकिन इसे अपने आप में लखमा की साजिश में भूमिका साबित करने वाला अलग न्यायिक निष्कर्ष नहीं बताया गया है।