स्वतंत्र बोल
नई दिल्ली/तमिलनाडु,07 अप्रैल 2026:
भारत ने न्यूक्लियर ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक छलांग लगाई है, जिसने देश को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है। Kalpakkam स्थित न्यूक्लियर पावर प्लांट में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल को सफलतापूर्वक ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल कर ली है।
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इसका मतलब है कि अब रिएक्टर में न्यूक्लियर चेन रिएक्शन अपने आप चलने लगा है—यानी एक ऐसा सिस्टम, जो खुद ऊर्जा पैदा करता है और भविष्य के लिए ईंधन भी तैयार करता है।
भाभा का सपना आखिरकार हुआ पूरा
भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक Homi J. Bhabha ने 1950 के दशक में एक ऐसे ऊर्जा मॉडल की कल्पना की थी, जो थोरियम के जरिए देश को सस्ती और दीर्घकालिक ऊर्जा दे सके।
अब, करीब 70 साल बाद, यह सपना साकार हुआ है और भारत ने इस दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा दिया है।
दुनिया में सिर्फ दूसरा देश बना भारत
इस उपलब्धि के साथ भारत अब Russia के बाद दूसरा देश बन गया है, जिसने इस स्तर की ऑटोमैटिक न्यूक्लियर चेन रिएक्शन तकनीक हासिल की है।
यह उपलब्धि न सिर्फ तकनीकी रूप से बड़ी है, बल्कि भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी अहम मानी जा रही है।
कैसे काम करता है ये रिएक्टर?
कलपक्कम में बना 500 मेगावाट का यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्लूटोनियम-यूरेनियम मिश्रित ईंधन का उपयोग करता है और इसमें कूलेंट के रूप में तरल सोडियम का इस्तेमाल होता है।
सामान्य रिएक्टर जहां ईंधन खर्च करते हैं, वहीं यह रिएक्टर उससे ज्यादा नया फिसाइल मटेरियल तैयार करता है—यानी यह ‘ऊर्जा के साथ ईंधन भी बनाता’ है।
तीन-स्टेज प्रोग्राम की बड़ी कामयाबी
भारत का न्यूक्लियर प्रोग्राम तीन चरणों में बनाया गया है:
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पहला: यूरेनियम आधारित PHWR रिएक्टर
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दूसरा: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR)
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तीसरा: थोरियम आधारित रिएक्टर
PFBR की सफलता दूसरे चरण को मजबूत करती है और भविष्य में थोरियम के बड़े पैमाने पर उपयोग का रास्ता खोलती है।
एनर्जी आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम
भारत के पास यूरेनियम सीमित है, लेकिन थोरियम का विशाल भंडार है। ऐसे में यह टेक्नोलॉजी देश को लंबे समय तक सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा देने में सक्षम होगी।
यह उपलब्धि 2070 तक ‘नेट-जीरो’ लक्ष्य हासिल करने में भी अहम भूमिका निभाएगी।
आसान नहीं था यह सफर
इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2004 में हुई थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों, सुरक्षा मानकों और लागत बढ़ने जैसी कई बाधाओं के कारण इसमें देरी हुई।
तरल सोडियम जैसे संवेदनशील कूलेंट को संभालना और उच्च तापमान पर सिस्टम को स्थिर रखना बेहद जटिल काम था।
इसके बावजूद भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इस चुनौती को पार कर यह ऐतिहासिक सफलता हासिल की।
