वोट चोरी के आरोपों के बीच 124 पूर्व अफसरों ने चुनाव आयोग के लिए क्या कहा?

Gyanesh Kumar PTI 1791636713426 m

स्वतंत्र बोल
नई दिल्ली 10 अक्टूबर 2026:
 वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और वोट चोरी के आरोपों के बीच 124 पूर्व IAS-IFS अधिकारियों ने चुनाव आयोग (ECI) और मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का बचाव किया है। भारत के नागरिकों के नाम लिखे खुले पत्र में पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि चुनावी धांधली के आरोपों के लिए ठोस सबूत होने चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना प्रमाण वोटों में गड़बड़ी के दावे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं।

ad

विपक्ष के प्रदर्शन के बीच आया खुला पत्र

पूर्व अधिकारियों का यह पत्र ऐसे समय आया है, जब विपक्षी नेता मतदाता सूची में गड़बड़ी और वोट चोरी का आरोप लगाकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। इस विवाद को लेकर दिल्ली में भी प्रदर्शन हुए हैं।

youtube

शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश कर रहे कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया।

‘हमारा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं’

खुले पत्र में पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि उन्होंने अपना करियर चुनाव कराने और चुनावी प्रक्रिया का अध्ययन करने में बिताया है। इसमें मतदाता सूची तैयार करने से लेकर उन स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा तक का काम शामिल रहा है, जहां इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) रखी जाती हैं।

पत्र में उन्होंने लिखा कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं। उनके मुताबिक, बिना सबूत चुनावों के लिए बार-बार धांधली जैसे शब्दों का इस्तेमाल उस लोकतांत्रिक भरोसे को चोट पहुंचाता है, जो सभी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है।

‘हम जानते हैं कि धांधली वाला चुनाव कैसा होता है’

पूर्व अधिकारियों ने पत्र में चुनावों में पहले होने वाली गड़बड़ियों का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि वे ऐसे दौर में काम कर चुके हैं, जब मतदान केंद्रों पर कट्टे और बाहुबलियों के लोगों का दबदबा होता था। बैलेट बॉक्स भरने या चोरी करने और मतदाताओं को मतदान से लौटा देने जैसी घटनाएं होती थीं।

पत्र के मुताबिक, बूथ कैप्चरिंग उस समय इतनी आम थी कि संसद ने 1989 में इसे अपराध घोषित कर दिया। अधिकारियों ने लिखा, “जब हिंसा बोलती है तो लोकतंत्र चुप हो जाता है।”

पूर्व नौकरशाहों का तर्क है कि चुनावी धांधली के आरोपों को गंभीरता से लेने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। उन्होंने बिना प्रमाण ऐसे दावों को बार-बार दोहराए जाने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे को लेकर चिंता जताई।