मानसून सीजन खत्म होने में अब करीब 9 दिन का समय बचा है, लेकिन देश में बारिश की कमी बड़ी चिंता बन गई है। 1 जून से 21 सितंबर तक देश में 703.7 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर 827.2 मिमी बारिश होनी चाहिए थी। यानी 123.5 मिमी कम पानी बरसा है। यह सामान्य से करीब 15% कम है।
पूरे मानसून सीजन में सामान्य बारिश का आंकड़ा 868.6 मिमी माना जाता है। ऐसे में बचे दिनों में 15% की कमी पूरी करना मुश्किल माना जा रहा है। देश के 47% जिलों में सामान्य से 20% से ज्यादा बारिश की कमी बनी हुई है।
इन राज्यों में बारिश सबसे कम
बारिश की कमी कई बड़े राज्यों में देखने को मिल रही है। आंध्र प्रदेश में 40%, पंजाब में 39% और बिहार में 37% की कमी दर्ज की गई है। कर्नाटक में 31%, केरल में 28%, हरियाणा में 23% और राजस्थान में 21% कम बारिश हुई है। महाराष्ट्र में कमी 17% रही। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सामान्य से 5-5% कम बारिश दर्ज की गई है।
मध्य प्रदेश के 36 जिलों में बारिश का कोटा अधूरा
मध्य प्रदेश में 21 सितंबर तक 865.8 मिमी बारिश दर्ज हुई। सामान्य आंकड़ा 922.6 मिमी है। इस तरह प्रदेश में बारिश करीब 6% कम रही। 55 में से 36 जिलों में सामान्य बारिश का कोटा पूरा नहीं हुआ। 11 जिलों में बारिश की कमी 16% से 49% तक पहुंच गई है। इनमें पश्चिमी मध्य प्रदेश के जिले ज्यादा प्रभावित हैं। अलीराजपुर में 49%, नर्मदापुरम में 34%, रतलाम में 33%, झाबुआ में 32% और हरदा में 31% की कमी रही। इंदौर और छिंदवाड़ा में यह कमी 23% दर्ज की गई।
भोपाल में सामान्य से ज्यादा बारिश
पश्चिमी मध्य प्रदेश में जहां बारिश की कमी बनी हुई है, वहीं भोपाल में सामान्य से ज्यादा पानी बरसा। यहां 928.2 मिमी के सामान्य आंकड़े के मुकाबले 1063.3 मिमी बारिश दर्ज हुई। यह सामान्य से 12% ज्यादा है। भारी बारिश का असर जलाशयों पर भी दिखा। बड़ा तालाब पूरा भर गया। भदभदा और कलियासोत बांध के गेट पांच-पांच बार खोलने पड़े। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बारिश वाले पांच जिलों में मऊगंज में 1422.8 मिमी, सतना में 1318.7 मिमी, निवाड़ी में 1183.7 मिमी, शहडोल में 1130.4 मिमी और मंडला में 1113.8 मिमी बारिश दर्ज की गई।
40 बड़े जलाशयों में सिर्फ 6 पूरी तरह भरे
मध्य प्रदेश के 40 बड़े जलाशयों में से 6 पूरी तरह भर पाए हैं। 7 जलाशय 50% से कम भरे हैं। 3 जलाशयों में 50% से 75% तक पानी है। 13 जलाशय 75% से 90% तक भरे हैं। वहीं 11 जलाशय 90% से 100% तक भरे हैं। इस तरह जलाशयों की स्थिति भी अलग-अलग बनी हुई है।
अल नीनो को भी माना जा रहा कारण
बारिश की कमी के पीछे अल नीनो परिस्थितियों को एक प्रमुख कारण बताया गया है। ICRA की सितंबर की रिपोर्ट में भी अल नीनो परिस्थितियों और सामान्य से ज्यादा तापमान को मिट्टी की नमी और फसल उत्पादन के लिए जोखिम बताया गया है। अल नीनो में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक हवाओं और मौसम के पैटर्न में बदलाव आता है। इसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।
राजस्थान से मानसून की वापसी शुरू
19 सितंबर से पश्चिमी राजस्थान से मानसून की वापसी शुरू हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा के कुछ हिस्सों और राजस्थान के कई इलाकों से भी मानसून विदा हो चुका है। मौसम विभाग के मुताबिक अगले चरण में दिल्ली, हरियाणा के बाकी हिस्सों, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से मानसून की वापसी की परिस्थितियां बन रही हैं।
बंगाल की खाड़ी में बन रहा नया सिस्टम
बंगाल की खाड़ी में एक नया मौसम सिस्टम तैयार हो रहा है। इसके डीप डिप्रेशन में बदलने की बात कही गई है। इससे पूर्वी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में अगले कुछ दिनों में बारिश का दौर बन सकता है। मध्य प्रदेश में भी मानसून के इस आखिरी दौर से बारिश होने की उम्मीद है। इससे कम बारिश वाले जिलों को कुछ राहत मिल सकती है।
खेती पर बढ़ सकता है दबाव
कम बारिश का असर खेती पर भी पड़ रहा है। अगस्त तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में 1.7% कम थी। ICRA ने पूरे सीजन में खरीफ रकबे में 1-2% की कमी का अनुमान जताया था। साथ ही ज्यादा तापमान और अल नीनो से मिट्टी की नमी पर जोखिम बताया था। कम बारिश और मिट्टी में नमी की कमी का असर फसलों की पैदावार पर पड़ सकता है। चावल उत्पादन को लेकर भी चिंता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में चावल उत्पादन करीब 1 करोड़ टन घटकर 14.4 करोड़ टन रह सकता है, जो पिछले साल से 6.5% कम होगा।
रबी की बुवाई पर भी नजर
अक्टूबर से गेहूं और चना जैसी रबी फसलों की बुवाई शुरू होगी। शुरुआती दौर में खेतों की सिंचाई के लिए पानी की जरूरत होती है। ICRA ने उत्तर और दक्षिण भारत में जलाशयों में घटते पानी को रबी की बुवाई के लिए जोखिम बताया है।
जलाशयों में पिछले साल से 21% कम पानी
देश के 178 प्रमुख जलाशयों में 131.17 अरब क्यूबिक मीटर पानी बचा है। यह पिछले साल की समान अवधि के 165.65 अरब क्यूबिक मीटर से करीब 21% कम है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा भंडारण कुल लाइव स्टोरेज क्षमता का करीब 71% है। कम जल भंडारण का असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है। जलविद्युत संयंत्रों के लिए पानी कम होने पर बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, गर्मी और सूखे की स्थिति में बिजली की मांग बढ़ने का दबाव रहता है।


