7 साल का रिश्ता, शादी का वादा और अचानक छोड़ा सड़क पर… लेकिन कोर्ट ने कहा – ये ‘जबरन नहीं’, कुछ और ही था सच

स्वतंत्र बोल
बिलासपुर,15 अप्रैल 2026: सात साल तक चले रिश्ते, शादी के वादे, धमकियों और शोषण के गंभीर आरोपों से जुड़े एक मामले में आखिरकार हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया, जिसने पूरे घटनाक्रम पर नई बहस छेड़ दी है। शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण करने के आरोपी को पहले ट्रायल कोर्ट से मिली राहत को चुनौती देने वाली याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि यह मामला जबरन शोषण का नहीं, बल्कि आपसी सहमति से बने संबंध का है।

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कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया है कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ रही और लगभग सात वर्षों तक उसके साथ संबंध में रही। इस स्वीकारोक्ति के आधार पर अदालत ने माना कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और पीड़िता एक परिपक्व महिला होने के नाते अपने फैसले लेने में सक्षम थी।

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पूरा मामला क्या है?
मामले की शुरुआत वर्ष 2013 से होती है, जब रायगढ़ में पढ़ाई के दौरान पीड़िता की मुलाकात आरोपी से हुई। 2014 में जब परिवार ने उसकी शादी कहीं और तय की, उसी दौरान आरोपी ने उसे शादी का प्रस्ताव दिया। आरोप है कि 12 मार्च 2014 की सुबह आरोपी गांव पहुंचा और उसे झोपड़ी में ले जाकर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए।

इसके बाद आरोपी उसे रायगढ़ ले गया, जहां करीब एक सप्ताह तक धर्मशाला में रखा और संबंध बनाए। फिर उसे अंबिकापुर ले जाकर सात वर्षों तक अपने साथ रखा। इस दौरान पीड़िता का आरोप था कि आरोपी शादी की बात टालता रहा, धमकाता रहा और उसे परिवार से दूर रखा।

मामले ने उस वक्त और डरावना मोड़ ले लिया जब 20 अगस्त 2021 को आरोपी उसे गांव ले गया और सड़क पर छोड़कर फरार हो गया। इस घटना के बाद परिवार पर भी गहरा असर पड़ा और मानसिक तनाव में पिता को पैरालिसिस तक हो गया।

करीब ढाई महीने बाद 9 नवंबर 2021 को पीड़िता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और धोखाधड़ी की धाराओं में मामला दर्ज किया।

कोर्ट में क्या हुआ?
ट्रायल कोर्ट ने सबूतों और परिस्थितियों के आधार पर आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि संबंध आपसी सहमति से थे। इस फैसले को पीड़िता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिका में दावा किया गया कि आरोपी ने शुरू से ही शादी का झूठा वादा कर उसका भरोसा जीता और शोषण किया। लेकिन हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि पीड़िता की उम्र उस समय लगभग 23 वर्ष थी, जिससे स्पष्ट है कि वह एक परिपक्व वयस्क थी और अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम थी। साथ ही, घटना के बाद शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को लेकर भी कोई ठोस कारण सामने नहीं आया।

फैसले की अहम बात
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा नहीं दी जा सकती। सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और आरोपी की दोषमुक्ति बरकरार रखी।

इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि रिश्तों, वादों और सहमति की सीमाएं आखिर कहां तय होती हैं—और कब एक निजी संबंध कानून के दायरे में अपराध बन जाता है।