स्वतंत्र बोल
रायपुर,02 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ की मिट्टी से निकली एक ऐसी कहानी, जो संघर्ष, असफलता और जिद से बनी है—और अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना रही है। 24 साल की किरण पिस्दा आज भारतीय महिला फुटबॉल में उभरता हुआ नाम हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा।
|
WhatsApp Group
|
Join Now |
|
Facebook Page
|
Follow Now |
|
Twitter
|
Follow Us |
|
Youtube Channel
|
Subscribe Now |
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के सेमीफाइनल में जब उन्होंने गोलकीपर के दस्ताने पहने और पेनल्टी शूटआउट में टीम को संभाला, तब वह सिर्फ मैच नहीं खेल रहीं थीं—बल्कि अपने संघर्षों को जीत में बदल रही थीं। उनके हर फैसले में वो अनुभव झलक रहा था, जो उन्होंने कठिन दौर से गुजरते हुए हासिल किया।
किरण को शुरुआत से ही स्कूल और परिवार का साथ मिला, लेकिन असली प्रेरणा उन्हें अपने भाई गिरीश पिस्दा से मिली, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं। यहीं से उनके भीतर बड़े सपनों की नींव पड़ी। पढ़ाई के दौरान रायपुर आने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ महिला लीग में शानदार प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय शिविर तक पहुंचीं। लेकिन यहां उन्हें बड़ा झटका लगा—कम फिटनेस और अनुभव की कमी के कारण वह भारतीय टीम में जगह नहीं बना सकीं। यही पल उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। उन्होंने खुद को पूरी तरह बदलने का फैसला लिया।
किरण ने अपनी फिटनेस पर कड़ी मेहनत की, खेल को समझने के लिए मैचों का विश्लेषण शुरू किया और सबसे बड़ी बात—अपनी सोच को सकारात्मक बनाया। उनके इस बदलाव में कोच योगेश कुमार जांगड़ा की अहम भूमिका रही, जिन्होंने हर मुश्किल वक्त में उन्हें संभाला और आगे बढ़ने की ताकत दी।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। घरेलू स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर उन्हें केरल ब्लास्टर्स जैसे क्लब के साथ खेलने का मौका मिला। इतना ही नहीं, उन्होंने यूरोप की लीग में भी कदम रखा और डिनामो ज़ाग्रेब के लिए खेलकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
किरण की सबसे बड़ी ताकत उनकी बहुमुखी प्रतिभा है। उन्होंने स्ट्राइकर के रूप में शुरुआत की, फिर मिडफील्ड में खेलीं और अब फुल-बैक के रूप में टीम का हिस्सा हैं। यह लचीलापन ही उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाता है।
हालांकि, सफलता के बीच असफलताएं भी उनका पीछा करती रहीं। हाल ही में बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना उनके लिए एक और झटका था, लेकिन उन्होंने इसे हार नहीं, बल्कि सीख के रूप में लिया। उनका मानना है कि “अगर चयन नहीं होता, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं—बल्कि आपको और मेहनत करनी होगी।”
जनजातीय पृष्ठभूमि से आने वाली किरण आज उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो दूर-दराज के इलाकों से निकलकर बड़े सपने देखते हैं। उनका कहना है कि खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे मंच इन प्रतिभाओं को आगे लाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
आज किरण का लक्ष्य सिर्फ टीम में जगह बनाना नहीं, बल्कि भारत के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार प्रदर्शन करना है। उनकी कहानी यही बताती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हर सपना सच हो सकता है।
