स्वतंत्र बोल
रायपुर 18 जून 2026: छत्तीसगढ़ में हाथियों की बढ़ती संख्या जहां वन्यजीव संरक्षण की सफलता के रूप में देखी जा रही है, वहीं लगातार हो रही हाथी शावकों की मौतों ने वन विभाग की रणनीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले 25 दिनों के भीतर चार हाथी शावकों की मौत और बीते छह महीनों में 10 शावकों के मारे जाने के आंकड़ों ने वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षणवादियों की चिंता बढ़ा दी है।
जानकारी के अनुसार प्रदेश में वर्तमान समय में लगभग 450 हाथी विचरण कर रहे हैं। वन विभाग का दावा है कि वर्ष 2022 में जहां हाथियों की संख्या करीब 240 थी, वहीं 2026 तक यह बढ़कर लगभग 450 हो गई है। विभाग इसे संरक्षण और प्रबंधन की बड़ी उपलब्धि मान रहा है, लेकिन दूसरी ओर हाथियों की मौत और बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष ने इस सफलता पर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों की मौत के वास्तविक और वैज्ञानिक कारणों की गहराई से जांच बेहद जरूरी है। यदि मृत्यु के सटीक कारणों का पता लगाया जाए तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है और संरक्षण रणनीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
वन विभाग ने हाथियों की निगरानी और उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रखने के लिए कई आधुनिक और पारंपरिक उपाय अपनाने का दावा किया है। इनमें ड्रोन निगरानी, सैटेलाइट आधारित एलिफेंट ट्रैकिंग एप, रेडियो कॉलर, मधुमक्खी पालन, सोलर फेंसिंग और प्रशिक्षित हाथियों की मदद से प्रबंधन जैसी योजनाएं शामिल हैं। हालांकि जमीनी स्तर पर इन उपायों का अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा है।
बताया जा रहा है कि कर्नाटक से लाए गए प्रशिक्षित हाथियों की योजना भी विशेष सफलता हासिल नहीं कर सकी। वहीं चारागाह विकसित करने, खेतों में पुतले लगाने और हाथियों के मार्ग को नियंत्रित करने जैसे प्रयास भी संघर्ष को कम करने में प्रभावी साबित नहीं हुए हैं।
हाथियों की बढ़ती आबादी के साथ मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। इसी चुनौती से निपटने और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से हाल ही में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था, जिसमें विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक प्रबंधन और संरक्षण के नए उपायों पर चर्चा की थी।
लगातार हो रही शावकों की मौतों ने यह संकेत दिया है कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और वैज्ञानिक मूल्यांकन की भी आवश्यकता है। अब वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों की नजर इस बात पर टिकी है कि इन मौतों के पीछे के वास्तविक कारण क्या हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।


