साड़ी घोटाला अपडेट: शिकायतों पर जाँच समिति बना, भुगतान रोका.. फिर भी भ्रष्टाचार के भंवर में घिर गई मंत्री।

स्वतंत्र बोल
रायपुर 27 अप्रैल 2026.  महिला बाल विकास विभाग के साडी घोटाले में मंत्री स्टाफ ने खेल कर दिया। वही स्टाफ जिनकी जिम्मेदारी मंत्री को पल-पल के गतिविधियों से अपडेट रखने की थी, उसी ने खेल कर दिया और मंत्री चौतरफा फंस गई। साडी घोटाले में जीतनी भूमिका विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेताओ ने निभाया है उससे कही ज्यादा भूमिका मंत्री के साथ रहने वालो ने निभाया है। बताते है गुमराह करने का खेल तो ढाई वर्षो से चल रहा है और मंत्री से सेल्फ गोल हो जाता है।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में साडी खरीदने कार्यादेश 26 मार्च 2025 को जारी किया गया, तब आईसीडीएस सेक्शन के प्रभारी सुनील शर्मा थे। सप्लाई का ठेका जशपुर के साक्षी गारमेंट नामक फार्म को मिला जिसके संचालक बीजेपी के नेता बताये जाते है। इन्होने काम शुभम अग्रवाल नामक सप्लायर को सबलेट कर दिया। साड़ियों की सप्लाई का काम सितंबर के अंत से शुरू हुआ और दिसंबर में जिलों से शिकायते मिलने लगी.आंगनबाड़ी वर्कर्स को शिकायते थी कि सदी की लम्बाई छोटी है, रंग छोड़ रहा और कटाफटा है.. शुरुआती शिकायते बिलासपुर जिले से निकली। संचालक महिला बाल विकास तक शिकायते पहुची तो जाँच समिति 28 जनवरी 2026 को वित्त के संयुक्त संचालक के अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जाँच समिति बनाई गई। समिति ने महीने भर के भीतर रिपोर्ट दिया।

भुगतान रोका, साडी वापसी करने लिखा-
जाँच समिति की रिपोर्ट के बाद महिला बाल विकास संचालक ने खादी एवं ग्रामोद्योग के एमडी को पत्र लिखाकर सप्लायर के बचे भुगतान करीब पौसे 3 करोड़ रुपये रोकने और शिकायतों की जाँच कराने के साथ गुणवत्ताहीन साड़ियों की वापसी करने पत्र मार्च के पहले सप्ताह में लिखा। तीन सदस्यीय जाँच समिति की रिपोर्ट पर प्रभावी कार्यवाही करने मंत्री राजवाड़े ने अप्रैल के पहले सप्ताह में छह सदस्यीय समिति बनाया जिसके अध्यक्ष दिलदार सिंह मरावी थे, जिनकी जिम्मेदारी शिकायतों का समाधान कर साड़ियों की वापसी करना था,, इस समिति ने क्या काम किया अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। उधर इसी बीच अप्रैल के दूसरे सप्ताह में साड़ी खरीदी में कमीशनखोरी के खबरों से ऐसा भूचाल आया कि मंत्री और अधिकारी हिल गए। सप्लाई ठेका और संविदा से वंचित कुछ लोगो ने जमकर रायता फैलाया, स्थिति ऐसी कि जिम्मेदारों के पास जवाब नहीं था। कुर्सी बचाने वालो ने एक तर्क यह भी दिया एक विधायक , मंत्री बनाने लालायित है और वही मीडिया को पुड़िया दें रही है.. जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है।

दरअसल पूरा सिस्टम यही चरमराया, जिस गड़बड़ी और कमीशनखोरी की जाँच तीन महीने पहले चल रही थी, कई जाँच समितियां बनाई गई थी तो उसे मंत्री को सही तरीके से ब्रीफ नहीं किया गया.. मंत्री के स्टाफ अपना कुर्सी बचाने में और पीआर टीम फोटो रील्स में उलझे रहे, जबकि जिम्मेदारी थी पूरे वस्तु स्थिति से मीडिया को अवगत कराया जाता,,फ्रंट फुट पर बैटिंग होती पर ऐसा नहीं हुआ। ग्रमोद्योग बोर्ड ने 9 करोड़ 70 लाख में अभी तक करीब पौने तीन करोड़ का भुगतान सप्लायर को नहीं किया है, जिसके लिए बोर्ड के एमडी पर दबाव बनाने की कोशिश भी की गई थी। संयोग है कि सप्लायर शुभम अग्रवाल भी सूरजपुर का रहवासी है।

साड़ी खरीदी घोटाला: सप्लायर को उपकृत करने एमडी ने नहीं किया टेंडर, सीधे दे दिया वर्कआर्डर..