स्वंतत्र बोल
नई दिल्ली 24 सितंबर 2026: चुनाव आयोग में मतभेदों का लंबा इतिहास: 1989 से अब तक जब भी बढ़ा विवाद, खुलकर सामने आईं दूरियां
चुनाव आयोग में अंदरूनी मतभेदों और टकराव का सिलसिला नया नहीं है। जब से यह संस्था बहु-सदस्यीय निकाय बनी है, तभी से मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकार क्षेत्र तथा काम-काज को लेकर विवाद उठते रहे हैं। इसकी शुरुआत अक्टूबर 1989 से हुई, जब केंद्र सरकार ने पहली बार आयोग में दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की थी। उसके बाद से 1993, 2006-2009, 2019 और 2024 तक कई मौकों पर चुनाव आयुक्तों के बीच खींचतान, असहमति और इस्तीफे की घटनाएं सामने आती रही हैं।
1989 में पहली बार बना बहु-सदस्यीय निकाय, 1990 में वापस बदला फैसला
अक्टूबर 1989 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) आर.वी.एस. पेरी शास्त्री के कार्यकाल के दौरान दो चुनाव आयुक्तों एस.एस. धनोआ और वी.एस. सेगल की नियुक्ति की गई थी। शास्त्री ने इस बदलाव पर कभी सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन माना जाता है कि उन्होंने इसे अपनी शक्तियों में कटौती के रूप में देखा। इसके बाद जनवरी 1990 में दोनों नए आयुक्तों की नियुक्ति रद्द कर दी गई और आयोग फिर से एक-सदस्यीय संस्था बन गया।
1993 में टीएन शेषन और दो नए आयुक्तों के बीच खुला टकराव
अक्टूबर 1993 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर आयोग को दोबारा बहु-सदस्यीय निकाय बनाया गया। शेषन ने इसे अपने पद की स्वतंत्रता पर हमला माना और दोनों नए आयुक्तों को स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्होंने उनके साथ सरकारी दस्तावेज साझा नहीं किए, उन्हें बैठकों में आने से रोका और कोई दफ्तरी काम नहीं सौंपा। उन्होंने एक इंटरव्यू में खुलेआम दोनों का मजाक भी उड़ाया था।
सुप्रीम कोर्ट का 1995 का ऐतिहासिक फैसला: CEC सिर्फ ‘बराबर वालों में पहला’
टीएन शेषन ने आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने के सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 1995 में इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का दर्जा, शक्तियां और निर्णय लेने के अधिकार बिल्कुल एक समान हैं। अदालत ने कहा कि सीईसी केवल ‘बराबर वालों में सबसे पहला’ (First among equals) होता है।
2006 से 2009: एन. गोपालस्वामी और नवीन चावला का विवाद
वर्ष 2006 से 2009 के दौरान तत्कालीन सीईसी एन. गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच गंभीर मतभेद सामने आए। गोपालस्वामी ने अपना कार्यकाल खत्म होने से कुछ महीने पहले राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चावला को पद से हटाने की सिफारिश कर दी थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि चावला बैठकों की जानकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को दे रहे थे। हालांकि, तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने यह सिफारिश खारिज कर दी और बाद में नवीन चावला ही मुख्य चुनाव आयुक्त बने।
2019 और 2024: अशोक लवासा और अरुण गोयल के इस्तीफे पर चर्चाएं
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन सीईसी सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच आचार संहिता के मामलों पर असहमति सामने आई थी। लवासा ने अपनी असहमति दर्ज कराई थी, जिसे आयोग ने सार्वजनिक किए बिना खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया था कि असहमति नोट केवल अर्ध-न्यायिक आदेशों में सार्वजनिक होते हैं। बाद में लवासा ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया और एशियन डेवलपमेंट बैंक में चले गए। इसके बाद 9 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने भी कार्यकाल के बीच में निजी कारणों से इस्तीफा दे दिया था, जिसे तत्कालीन सीईसी राजीव कुमार के साथ संबंधों में अनबन की अटकलों से जोड़कर देखा गया था।


