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मनोरंजन डेस्क 5 अक्टूबर 2026 : अजय देवगन और जयदीप अहलावत स्टारर फिल्म ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। महात्मा गांधी का जीवन जहां सत्य का प्रतीक माना जाता है, वहीं इस सस्पेंस थ्रिलर में सत्य और झूठ के बीच की लकीर पूरी तरह धुंधली नजर आती है। फिल्म का अंत दर्शकों के सामने यह बड़ा सवाल छोड़ता है कि क्या इस बार दोषी की शिनाख्त हो पाई या शातिर दिमाग के आगे कानून एक बार फिर पस्त हो गया।
गलत होकर भी हीरो बना विजय सलगांवकर
फिल्म में एक जगह अपने बेटे सैम को खो चुकी मीरा देशमुख (तब्बू) अपने पति महेश देशमुख (रजत कपूर) से कहती हैं, “हर किसी को यह कहानी उसके नजरिये से देखने को मजबूर करती है। यानी विजय सलगांवकर गलत होकर भी हीरो है और हम सही होकर भी विलेन।” यह संवाद फिल्म के पूरे ताने-बाने को उजागर करता है। पहले भाग से ही विजय सलगांवकर (अजय देवगन) सच छुपाने में लगा रहता है और पुलिस की तमाम कोशिशें नाकाम साबित होती हैं।
‘कहानी बदल दो तो सच भी बदल जाता है’
फिल्म में अजय देवगन का एक वाइस ओवर बेहद अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद उनका किरदार कहता है, “इस दुनिया में दो तरह की कहानियां होती हैं—एक जो सच को छुपाती है और दूसरी खुद सच बन जाती है। दोनों में फर्क सिर्फ एक है कि कहानी सुना कौन रहा है।” फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि कैसे शब्दों और दृश्यों से एक कहानी रची जाती है, जो देखने वाले को वही यकीन दिलाती है जो उसने देखा या सोचा।
बिना शोर-शराबे के कसा हुआ ड्रामा
गोवा की बारिश, रात के अंधेरे और सस्पेंस की कालिमा के बीच एक केबल ऑपरेटर का दिमाग बड़े-बड़े जांच अधिकारियों की प्लानिंग पर पानी फेर देता है। बिना किसी भारी-भरकम शोर-शराबे के, सुगठित पटकथा और दिल को छूने वाले संवादों के दम पर यह फ्रेंचायजी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुई है। शांत और गहरे आत्मविश्वास से भरे अजय देवगन की अदाकारी फिल्म को मजबूत क्राफ्ट प्रदान करती है।
परिवार में कोई मतभेद नहीं, यही है सफलता का राज
सामान्य हिंदी फिल्मों में जब घर का कोई सदस्य अपराध करता है तो परिवार में मतभेद देखने को मिलते हैं। मां या पिता कानून का साथ देने की बात करते हैं। हालांकि, ‘दृश्यम’ में अपनी बेटी और परिवार की सुरक्षा के लिए पूरा सलगांवकर परिवार मास्टरमाइंड विजय की प्लानिंग के साथ शुरू से अंत तक बिना किसी विरोध के एकजुट खड़ा रहता है। यही एकजुटता और पुलिस पर मास्टरमाइंड का हावी होना दर्शकों में थ्रिल पैदा करता है, भले ही विजय सलगांवकर समाज का रोल मॉडल न हो।


