छत्तीसगढ़ के इस शहर ने 70 साल पहले लड़ी थी अपनी पहचान की लड़ाई, प्रधानमंत्री नेहरू तक पहुंची थी बात

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स्वतंत्र बोल
रायपुर 1 नवम्बर 2026:
छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस के अवसर पर प्रदेश के इतिहास से जुड़े कई अनछुए पन्ने सामने आते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और प्रेरणादायक इतिहास डोंगरगढ़ का है। यह कहानी साल 1956 की है, जब मध्यप्रदेश के गठन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर डोंगरगढ़ की तहसील को खैरागढ़ स्थानांतरित किए जाने की चर्चा उठी थी। इस खबर से स्थानीय लोग बेचैन हो गए थे, क्योंकि उन्हें अपनी प्रशासनिक पहचान छिनने का डर था। अपने शहर के हक और सुविधाओं को बचाने के लिए तब डोंगरगढ़ के लोग एकजुट हो गए थे और एक लंबा संघर्ष लड़ा था।

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बनी ‘तहसील बचाओ संघर्ष समिति’, शुरू हुआ अनशन

जब प्रशासनिक व्यवस्थाएं बदलने की सुगबुगाहट शुरू हुई, तो शहर के लोगों ने अधिवक्ता बसंत काले की अध्यक्षता और महंत मगनदास के सचिव पद के नेतृत्व में ‘तहसील बचाओ संघर्ष समिति’ का गठन किया। इस आंदोलन में सेठ केदारनाथ अग्रवाल, बस्ता भाई टैंक और राधाकिशन अग्रवाल भगत समेत कई प्रमुख नागरिक शामिल हुए। अपनी मांग को मनवाने के लिए शहर में रैलियां निकाली गईं, प्रदर्शन हुए और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी गई। महंत मगनदास, केदारनाथ अग्रवाल और राधाकिशन भगत ने इस आंदोलन के तहत अनशन किया था।

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प्रधानमंत्री नेहरू तक पहुंची थी बात, ऐसे सुलझा था विवाद

अधिवक्ता बसंत काले इस आंदोलन का कानूनी मार्गदर्शन कर रहे थे। धीरे-धीरे यह स्थानीय विरोध एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन गया। डोंगरगढ़ के लोगों की यह आवाज देश की राजधानी तक पहुंची और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इस मामले की जानकारी हुई। इसके बाद प्रधानमंत्री ने मध्यस्थता के लिए मनोहर भाई पटेल को जिम्मेदारी सौंपी।

मनोहर भाई पटेल की पहल पर आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच तीन दौर की बैठकें हुईं। आखिरकार सहमति बनी कि डोंगरगढ़ को खैरागढ़ तहसील के अधीन उपतहसील के रूप में रखा जाएगा और यहां अतिरिक्त तहसीलदार की पदस्थापना होगी। इस समझौते के बाद आंदोलन समाप्त हुआ और मनोहर भाई पटेल ने आंदोलनकारियों को नींबू पानी पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया था।

पुरानी तस्वीर से ताजा हुईं यादें

इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम की जानकारी डोंगरगढ़ के सेवानिवृत्त ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ललित किशोर नारंग ने साझा की है। दिलचस्प बात यह है कि श्री नारंग इस आंदोलन के मुख्य चेहरों में शामिल रहे महंत मगनदास के नाती हैं। इस कहानी के साथ सामने आई 70 साल पुरानी एक श्वेत-श्याम तस्वीर ने भी लोगों का ध्यान खींचा है, जिसमें डॉ. शिवदेव सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, सेठ भागचंद, जोध सिंह, बसंत काले, मगनदास और तफज्जुल हुसैन समेत आंदोलन से जुड़े तमाम दिग्गजों के नाम दर्ज हैं। आज छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस के मौके पर सामने आई यह गाथा याद दिलाती है कि किसी भी शहर की असली पहचान वहां के नागरिकों के हक के लिए खड़े होने वाले जज्बे से बनती है।