“पत्नी करवा चौथ का व्रत बीच में तोड़ देती थी…” पति का आरोप सुन हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

Bilaspur High Court Divorce Order

स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 29 सितंबर 2026:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में मंजूर तलाक की डिक्री को निरस्त कर दिया है। जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि पत्नी पर क्रूरता और परित्याग के आरोप साबित नहीं होते हैं। अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य उतार-चढ़ाव और मतभेद को कानूनी क्रूरता नहीं माना जा सकता।

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पति ने लगाए थे करवा चौथ का व्रत तोड़ने और क्रूरता के आरोप

महासमुंद निवासी इस दंपती की शादी 10 दिसंबर 2011 को गुरुद्वारा में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति ने याचिका में आरोप लगाया था कि शादी के कुछ महीनों बाद से ही पत्नी विवाद करने लगी थी और सास-ससुर का आदर नहीं करती थी। वह बिना बताए मायके चली जाती थी और धार्मिक नियमों का पालन न करते हुए यह कहकर करवा चौथ का व्रत बीच में ही तोड़ देती थी कि जब साथ रहना ही नहीं है तो व्रत का क्या फायदा। इसके अलावा पति ने पत्नी द्वारा आईपीसी की धारा 498-ए और घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराने को मानसिक क्रूरता बताया था।

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पत्नी का पलटवार: दहेज की मांग और मारपीट का लगाया आरोप

दूसरी तरफ, पत्नी ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह हमेशा अपना वैवाहिक जीवन बचाने के लिए तैयार रही। उसने ससुराल पक्ष पर दहेज की मांग और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया। पत्नी के मुताबिक, 2 जुलाई 2018 को जब वह रसोई में थी, तब सास और देवरानी ने पैसों को लेकर उसके साथ मारपीट की। पति ने उसके बाल पकड़कर कमरे में बंद कर दिया, जिससे उसका एक दांत टूट गया। वह किसी तरह वहां से निकलकर गुरुद्वारा पहुंची और परिजनों व पुलिस को सूचना दी।

हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: छोटे झगड़े और पुलिस शिकायत क्रूरता नहीं

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। डिवीजन बेंच ने कहा कि शादीशुदा जिंदगी में उतार-चढ़ाव, मतभेद और छोटे-मोटे झगड़े क्रूरता की श्रेणी में नहीं आते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी किसी प्रताड़ना या परेशानी के दौरान पुलिस में शिकायत दर्ज कराती है, तो उसे केवल तब क्रूरता माना जाएगा जब उसका आचरण इतना गंभीर हो कि साथ रहना असंभव हो जाए। हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में पति द्वारा लगाए गए सभी आरोप सामान्य किस्म के थे।