182 दिन की देरी और सरकार को लगा बड़ा झटका! नक्सल केस में हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती, अपील सीधे खारिज

 

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बिलासपुर, 16 मई 2026:  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ सरकारी फाइलों के घूमने और प्रक्रियाओं में समय लगने का बहाना बनाकर देरी माफ नहीं की जा सकती। 182 दिन की देरी पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए न सिर्फ देरी माफी आवेदन खारिज किया, बल्कि पूरी अपील को ही समयसीमा से बाधित मानते हुए निरस्त कर दिया।

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यह मामला नारायणपुर जिले के ओरछा थाना में दर्ज एक चर्चित नक्सल प्रकरण से जुड़ा है। इस केस में चंपा कर्मा, मांगी मंडावी, संकू मंडावी और लच्छू मंडावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आर्म्स एक्ट और यूएपीए की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

डिफॉल्ट बेल के खिलाफ गई थी सरकार

विशेष न्यायाधीश, एनआईए एक्ट एवं अनुसूचित अपराध न्यायालय नारायणपुर ने सितंबर 2025 में आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दे दी थी। राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, लेकिन यह अपील तय समयसीमा से पूरे 182 दिन की देरी से दायर की गई।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की खंडपीठ में हुई।

‘रेड टेप’ का बहाना नहीं चलेगा : हाईकोर्ट

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि विभागीय प्रक्रियाएं, शासन की मंजूरी, दस्तावेज जुटाने और फाइल मूवमेंट में समय लगने के कारण अपील दाखिल करने में देरी हुई।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून की समयसीमा सभी पर समान रूप से लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी विभाग सिर्फ “रेड टेप” और फाइल प्रक्रिया का हवाला देकर राहत नहीं मांग सकते।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि देरी माफी कोई अधिकार नहीं बल्कि अपवाद है। यदि देरी के पीछे ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक कारण नहीं दिए जाते, तो अदालत राहत नहीं दे सकती।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि सिर्फ यह बताना कि फाइल अलग-अलग विभागों में घूमती रही, पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता। सरकारी मशीनरी पर विशेष जिम्मेदारी होती है कि वह समयसीमा के भीतर गंभीरता और तत्परता से काम करे।

आखिरकार अपील हुई स्वतः खत्म

कोर्ट ने 182 दिन की देरी को लापरवाहीपूर्ण और अस्पष्टीकृत मानते हुए देरी माफी आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार की अपील भी स्वतः समाप्त हो गई। इस फैसले को प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की बड़ी और सख्त टिप्पणी माना जा रहा है।