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धर्म 21 सितंबर 2026 : भारत के प्रमुख आदिवासी त्योहारों में शामिल करमा पूजा (करम पर्व) इस साल 22 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ता है। मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश में उरांव, मुंडा, संथाल और बैगा समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति, कर्म, अच्छी फसल, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। इस दिन महिलाएं और बहनें परिवार की खुशहाली और भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं।
करम देवता की पूजा और करम पेड़ की डाल का महत्व
करम पर्व पर शक्ति, यौवन और कर्म के देवता माने जाने वाले करम देवता की पूजा की जाती है। इस अवसर पर करम वृक्ष या उसकी शाखा को लाकर घर के आंगन या अखाड़े में रोपा जाता है। इसे जीवन, शक्ति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। कई स्थानों पर कर्मा या सातो पेड़ की शाखाओं की भी पूजा की जाती है। यह पर्व करम वृक्ष के जरिए प्रकृति और आदिवासी जीवन के गहरे संबंध को प्रदर्शित करता है।
करमा पूजा में चढ़ने वाली सामग्री और पारंपरिक प्रसाद
करमा पूजा में करम देवता को कई तरह की पारंपरिक सामग्रियां अर्पित की जाती हैं:
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करम की डाली: करम या करमी वृक्ष की डाली को आंगन या अखाड़े में गाड़कर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
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खीरा: करम देवता को विशेष रूप से खीरा चढ़ाया जाता है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
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जाईं या जवा: धान, गेहूं, मक्का और जौ समेत सात प्रकार के अनाजों को टोकरी में उगाकर तैयार जाईं या जवा को पूजा में अर्पित किया जाता है।
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फूल और फल: लाल रंग के जावा फूल, मौसमी फल और फूल-मालाएं चढ़ाई जाती हैं।
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पारंपरिक पकवान: धुस्का, अरसा, ठेकुआ, चावल की खीर और चना दाल की पकौड़ी जैसे पकवान बनाए जाते हैं।
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अन्य सामग्री: रोली, अक्षत, दूध और कुछ स्थानों पर हड़िया (पारंपरिक पेय) का इस्तेमाल किया जाता है।
रातभर करमा नृत्य और सामूहिक उत्सव की परंपरा
पूजा संपन्न होने के बाद रातभर सामूहिक नृत्य और गीत-संगीत का आयोजन होता है। गांव के लोग एक साथ मिलकर मांदर और नगाड़ों की थाप पर करमा नृत्य करते हैं। मान्यता है कि करम वृक्ष की डाल के चारों ओर रातभर नृत्य करने से भाग्य के देवता प्रसन्न होते हैं। महिलाएं, पुरुष और युवा गोल घेरा बनाकर एक साथ नाचते-गाते हैं, जिससे सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और भाईचारा मजबूत होता है।
कृषि चक्र, समृद्धि और कथा का जागरण
करमा पर्व कृषि चक्र और वर्षा ऋतु के समापन से जुड़ा हुआ है। इसके जरिए खेतों में अच्छी पैदावार और समृद्धि के लिए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। पूजा की रात कर्मा-धर्मा की पौराणिक कथा सुनी जाती है। आधी रात के ‘अधरतिया’ और सुबह के ‘भिनसरिहा’ गीतों के माध्यम से पूर्वजों की कहानियों और जीवन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है।


