स्वतंत्र बोल
दंतेवाड़ा 16 जून 2026 :
दंतेवाड़ा जिले की 14 वर्षीय जागेश्वरी की कहानी किसी दर्दनाक रहस्य से कम नहीं है। जन्म के कुछ ही महीनों बाद उसके शरीर पर ऐसे बदलाव शुरू हुए, जिन्होंने धीरे-धीरे उसकी पूरी जिंदगी बदल दी। त्वचा पर उभरे छोटे-छोटे कांटों जैसे निशान समय के साथ इतने बढ़ गए कि उसका शरीर पेड़ की छाल जैसी मोटी और कठोर परतों से ढक गया। अब छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहल के बाद उसे एक बार फिर एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर उसकी निगरानी में इलाज कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार जागेश्वरी का जन्म वर्ष 2012 में हुआ था। जन्म के लगभग तीन महीने बाद ही उसके पैरों की त्वचा पर असामान्य बदलाव दिखाई देने लगे थे। परिवार को शुरुआत में इस बीमारी की जानकारी नहीं थी, इसलिए इसे बुरी नजर और अंधविश्वास से जोड़कर झाड़-फूंक तथा घरेलू उपायों का सहारा लिया गया। हालांकि इन प्रयासों से कोई राहत नहीं मिली और समय के साथ बीमारी गंभीर होती चली गई।
धीरे-धीरे उसके पूरे शरीर की त्वचा सूखी, मोटी और कठोर परतों में बदलने लगी। कई जगहों पर कांटों जैसी संरचनाएं दिखाई देने लगीं, जिससे उसकी स्थिति और भी जटिल हो गई। बीमारी का असर केवल शारीरिक नहीं रहा, बल्कि इसका गहरा असर उसके सामाजिक जीवन पर भी पड़ा।
जागेश्वरी की मां सुबी बताती हैं कि आसपास के बच्चे उसकी त्वचा को देखकर चिढ़ाते थे। लगातार तानों और उपहास के कारण वह धीरे-धीरे लोगों से दूर रहने लगी। खेलना-कूदना और सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीना उसके लिए मुश्किल होता चला गया।
एम्स रायपुर के त्वचा रोग विभाग के प्रमुख डॉ. मृत्युंजय सिंह के अनुसार जागेश्वरी का इलाज वर्ष 2019 में भी किया गया था। उस समय उसे करीब एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रखा गया था और उपचार के बाद उसकी स्थिति में सुधार देखने को मिला था। लेकिन यह एक दुर्लभ बीमारी है, जिसमें समय-समय पर लक्षण फिर से गंभीर हो सकते हैं।
डॉक्टरों ने बताया कि जागेश्वरी ‘इकथियोसिस हिस्ट्रिक्स’ नामक अत्यंत दुर्लभ त्वचा रोग से पीड़ित है। इस बीमारी में त्वचा अत्यधिक सूखी होकर मोटी परतों में बदल जाती है और कई स्थानों पर दरारें भी पड़ सकती हैं। बीमारी जानलेवा नहीं होती, लेकिन मरीज के सामान्य जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस रोग का स्थायी इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन नियमित दवाओं, चिकित्सकीय निगरानी और विशेष देखभाल से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। फिलहाल एम्स रायपुर में डॉक्टरों की टीम जागेश्वरी की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
परिवार को उम्मीद है कि इस बार भी उपचार से उसकी हालत में सुधार आएगा और वह एक बेहतर और सामान्य जीवन की ओर कदम बढ़ा सकेगी। जागेश्वरी का मामला दुर्लभ बीमारियों के प्रति जागरूकता, समय पर सही उपचार और अंधविश्वास से दूर वैज्ञानिक सोच अपनाने की जरूरत को भी सामने लाता है।


