स्वतंत्र बोल
बिलासपुर,02 मई 2026: दुष्कर्म के बाद निर्मम हत्या के मामले में एक चौंकाने वाला न्यायिक फैसला सामने आया है, जिसने पूरे मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है। महिला को बहलाकर जंगल ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म और फिर बेरहमी से हत्या करने वाले दोषी को पहले सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को हाई कोर्ट ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया है।
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हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मृत्युदंड केवल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों में ही दिया जा सकता है। कोर्ट ने पाया कि यह मामला उस सख्त मानदंड को पूरा नहीं करता, इसलिए आरोपी की सजा को बदलते हुए उसे जीवन भर की उम्रकैद दी जाती है। यानी दोषी को अब अपनी पूरी जिंदगी जेल में बितानी होगी। यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि बेहद भयावह है। बेमेतरा परिवार न्यायालय में भृत्य के पद पर कार्यरत 25 वर्षीय महिला 9 अगस्त 2022 को छुट्टी पर अपने गांव खैरमुड़ा आई थी। 14 अगस्त की सुबह वह अपने घर से बेमेतरा जाने के लिए निकली, लेकिन रास्ते में ही लापता हो गई। परिवार और ग्रामीणों ने उसकी काफी तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।
15 अगस्त को उसके पिता ने डभरा थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। जांच के दौरान पुलिस को एक युवक पर शक हुआ, जो महिला के संपर्क में था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आरोपी शंकर निषाद को हिरासत में लिया।
पूछताछ में आरोपी ने जो खुलासा किया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसने बताया कि घटना वाले दिन उसने महिला को फोन कर बुलाया और रास्ता बदलने का बहाना बनाकर उसे खरसिया स्टेशन तक ले गया। वहां से वह उसे पालगढ़ घाटी के जंगल में ले गया, जहां उसने पहले उसके हाथ बांधकर दुष्कर्म किया और फिर ब्लेड से हाथ और गले की नस काटकर उसकी हत्या कर दी।
आरोपी के निशानदेही पर पुलिस ने जंगल से शव बरामद किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हत्या की पुष्टि हुई। इस जघन्य अपराध के चलते जांजगीर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।
हालांकि, सजा की पुष्टि के लिए मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां विस्तृत सुनवाई के बाद कोर्ट ने यह बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अपराध गंभीर जरूर है, लेकिन यह ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला जाता है।
इस फैसले के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि किन मामलों में मृत्युदंड उचित है और किनमें नहीं।
