स्वतंत्र बोल
बिलासपुर,12 मई 2026: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पीएससी 2003 भर्ती घोटाले में एक बार फिर बड़ा मोड़ आ गया है। करीब 22 साल पुराने इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत के जरिए सुलह की कोशिश शुरू हुई है। हालांकि मामले की मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे ने साफ कर दिया है कि इस घोटाले में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है और अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट ही करेगा।
दरअसल, वर्षा डोंगरे की याचिका पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में बड़ा फैसला सुनाते हुए पीएससी 2003 भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को सही माना था। कोर्ट ने चयन सूची में संशोधन कर नई सूची जारी करने का आदेश दिया था। इस फैसले से कई रसूखदार अधिकारियों की कुर्सियां खतरे में आ गई थीं।
हाईकोर्ट के फैसले को चंदन त्रिपाठी समेत अन्य पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी और तब से मामला लंबित है। अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस विवाद को विशेष लोक अदालत के जरिए आपसी सहमति से सुलझाने की पहल की गई है।
मामले में वर्षा डोंगरे, छत्तीसगढ़ सरकार और प्रतिवादी निरुपमा लोनहरे समेत अन्य संबंधित पक्षों को मुंगेली और कबीरधाम जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं।
वर्षा डोंगरे का कहना है कि हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में स्पष्ट फैसला दिया था और राज्य सरकार को उसका पालन करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि पीएससी 2003 भर्ती में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई थी, जिसकी पुष्टि एसीबी जांच में भी हुई थी। ऐसे मामले में समझौते का सवाल ही नहीं उठता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि उत्तर पुस्तिकाओं में अंकों की हेराफेरी कर अपात्र उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाया गया। कई ऐसे उम्मीदवारों का चयन किया गया जो इंटरव्यू के लिए पात्र तक नहीं थे, जबकि योग्य उम्मीदवारों को बाहर कर दिया गया।
मामले में कोर्ट ने राजीव सिंह चौहान को सेवा से हटाने तक का आदेश दिया था। उन पर सामान्य वर्ग का होने के बावजूद गलत तरीके से एससी कोटे में नियुक्ति लेने का आरोप था। इसके अलावा कई अन्य अधिकारियों और उम्मीदवारों के चयन पर भी गंभीर सवाल उठे थे।
एसीबी रिपोर्ट और कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक कुल 52 ऐसे उम्मीदवार थे जो इंटरव्यू के लिए पात्र नहीं थे, लेकिन उनका चयन कर लिया गया। वहीं 17 योग्य उम्मीदवार चयन सूची से बाहर रह गए थे। अगर हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक दोबारा स्केलिंग कर नई मेरिट सूची जारी होती, तो दो दर्जन से ज्यादा अधिकारियों की नियुक्तियां प्रभावित होतीं, जिनमें कुछ वर्तमान में आईएएस पद तक पहुंच चुके हैं।
अब इस मामले में सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है, क्योंकि यह फैसला न सिर्फ कई अधिकारियों के भविष्य बल्कि छत्तीसगढ़ की सबसे चर्चित भर्ती प्रक्रियाओं में से एक की सच्चाई भी तय करेगा।


