स्वतंत्र बोल
रायपुर 07 मार्च 2025. ठाकुर रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ के संस्थापक स्वर्गीय उमा बाई जैतूसाव के बनाये बख्शीशनामा अनुसार मठ की जमीनों की कभी भी बिक्री नहीं हो सकती। उसके बाद भी धड़ल्ले से मंदिर ट्रस्ट की जमीने साल 1972 के बाद से लगातार बिकती गई। साल 1887 में उमाबाई जैतूसाव द्वारा बनाये गए बख्शीशनामा में स्पष्ट शब्दों में लिखा गया था कि मंदिर की जमीन किसी भी स्थिति में नहीं बिकेगी, जमीनों के मालिक भगवन ठाकुर रामचंद्र स्वामी होंगे.. विशेष परिस्थिति में जमीनों को रहन (रेघ) में दिया जा सकेगा।” उसके बाद भी मंदिर ट्रस्ट की जमीने बिकती गई। मौजूदा समय में मंदिर ट्रस्ट की जमीने बिकने के बाद आधी से भी कम रह गई है। अधिकांश जमीने मंदिर ट्रस्ट के लोगो ने बेचा है। यह सब कुछ पंजीयक और कलेक्टर के आँखों से सामने हो रहा है।
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दूसरे खसरे की थी अनुमति-
छत्तीसगढ़ लोक न्यास अधिनियम 1951 अनुसार पब्लिक ट्रस्ट की जमीने नहीं बेचीं जा सकती। विशेष परिस्थितियों में कलेक्टर की अनुमति के बाद ही जमीने बेचीं जाएगी। मठ के तत्कालीन महंत लक्ष्मीनारायण दास ने साल 1972 में तत्कालीन अतिरिक्त कलेक्टर की अनुमति से दतरेंगा और रेंगाडीह की जमीनों को बेच दिया। दतरेंगा की जिस खसरो को बेचने के लिए अनुमति मिली थी, वह वर्तमान में बेचीं गई जमीनों से भिन्न है। 1972 के बाद से लगातार 1987, 2000, 2002 और 2007 में मंदिर सैकड़ो अकड़ जमीने बिक गई। जमीनों को बेचने वाले मंदिर के महंत और ट्रस्टी है। साल 2002 में बिकी जमीन में अजय तिवारी बतौर गवाह है।
भूमाफियाओ का कमाल-
हाल ही दतरेंगा की मठ की जमीन के बेचे जाने पर विवाद हुआ है, उसकी अनुमति कलेक्टर ने नहीं दिया था। उस जमीन में भूमाफियाओ ने खेल किया है। विश्वश्त जानकारिनुसार भूमाफियाओ ने दतरेंगा में किसान की ढूंढा और उसे रुपयों का लालच देकर कोर्ट में केस लगाने तैयार किया। दस्तावेजो के अनुसार
नामान्तरण आवेदन में कथित किसानो ने अपने पिता के मृत्यु की तारीख और महीना नहीं बता सके, ना ही आवेदन में मृत्यु प्रमाण पत्र लगाया। दस्तावेजों के फर्जी होने की आपत्ति होने पर तत्कालीन तहसीलदार ने कथित किसानो से उनके पिता डेथ सर्टिफिकेट नहीं माँगा। सूत्रों के अनुसार भूमाफियाओ के संगठित गिरोह ने काम किया और नामान्तरण होने के बाद जमीन अविनाश बिल्डर को बेचने सौदा कर डाला। बिल्डर ने मंदिर से मिले प्रस्ताव के बाद मठ प्रबंधन, जमीन दलालो और किसानो को भुगतान कर दिया। जमीन के बदले किसानो को एक फिक्स राशि देकर बचत राशि किसानो से वापस ले लिया गया।
छद्म नाम से लेने की तैयारी-
राजधानी से सटे दतरेंगा में टाउनशिप बनाने की उदेश्य से करोडो रुपये फंसा चुके बिल्डर उलझन में है। बिल्डर सौदा रद्द कर पैसा वापस मांग रहे तो दूसरी तरफ मंदिर ट्रस्ट और कथित किसान पैसा वापस लौटाने की स्थिति में नहीं है। क़ानूनी उलझन में फंसे मंदिर ट्रस्ट ने पैसा लेकर प्रस्ताव पारित किया है, ऐसे में जमीन किसी तीसरी पार्टी के नाम रजिस्टर्ड कर खरीदने की तैयारी चल रही है।
मठ की जमीन बिकती रही और शिकायतों में उलझा रहा मठ प्रबंधन.. मंदिर को अरबो का नुकसान



