पहलगाम हमला: वो सवाल जो अब भी जवाब मांगते हैं
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जम्मू-कश्मीर के पर्यटन स्थल पहलगाम के पास बैसरन में हुए चरमपंथी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई, जिनमें गुजरात के शैलेशभाई कलाठिया भी शामिल थे। उनकी पत्नी शीतल कलाठिया का एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें उन्होंने अपने दर्द और सुरक्षा व्यवस्थाओं की कमी पर गुस्सा जताया।
सवाल 1: बैसरन में सुरक्षा क्यों नहीं थी?
बैसरन एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, और वहां सुरक्षा न होना चौंकाता है। वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन कहती हैं कि 1990 के दशक से कश्मीर में सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा आम बात रही है। फिर ऐसी जगह पर सुरक्षाबलों की गैरमौजूदगी कैसे हुई?
रिपोर्ट के अनुसार, हमले के समय सीआरपीएफ़ का कैंप घटनास्थल से सात किलोमीटर और राष्ट्रीय राइफल्स का कैंप पाँच किलोमीटर दूर था। पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपी वैद और लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) सतीश दुआ भी मानते हैं कि दूरदराज़ इलाक़ों में पर्यटकों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र बलों की मौजूदगी ज़रूरी थी।
सवाल 2: आम नागरिकों को निशाना क्यों बनाया गया?
यह हमला अलग था – इसमें पुलिस या सेना नहीं, बल्कि आम नागरिकों को निशाना बनाया गया। सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ का मानना है कि इसका मकसद देश के अन्य हिस्सों में भावनाएं भड़काना था।
प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू सवाल उठाते हैं कि क्या यह “सामान्य होते कश्मीर” के नैरेटिव को चुनौती देने की रणनीति है? पहले चरमपंथी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते थे – अब यह फर्क भी मिटता जा रहा है।
सवाल 3: क्या यह खुफिया तंत्र की विफलता थी?
हमले के पैमाने और उसके तरीके को देखते हुए यह सवाल भी उठता है – क्या हमारे ख़ुफ़िया तंत्र की बड़ी चूक हुई?
प्रो. मट्टू और लेफ्टिनेंट जनरल दुआ दोनों मानते हैं कि पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम कोई इलेक्ट्रॉनिक या मानवीय खुफ़िया जानकारी पहले से नहीं जुटा पाए?
दुआ का मानना है कि भारत को केवल तकनीकी निगरानी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘ह्यूमन इंटेलिजेंस’ यानी ज़मीनी स्तर पर सूचनाएं जुटाने की प्रणाली को भी मज़बूत करना चाहिए।
भारत की प्रतिक्रिया
हमले के बाद भारत सरकार ने सख़्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक हुई, और विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा कि इस हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं। भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई क़दम उठाए, जिनमें सिंधु जल समझौते का निलंबन, वीज़ा रद्द करना और अटारी सीमा बंद करना शामिल हैं।
निष्कर्ष:
पहलगाम हमला न सिर्फ एक दर्दनाक त्रासदी है, बल्कि यह सुरक्षा व्यवस्था, खुफिया तंत्र और चरमपंथी रणनीतियों पर नए सिरे से सोचने की चेतावनी भी है। जिन सवालों के जवाब अब भी अधूरे हैं, वे आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य प्रशासन दोनों के लिए गंभीर चुनौतियाँ हैं।
