स्वतंत्र बोल
बिलासपुर ,26 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ में एक चर्चित मामले में बड़ा मोड़ तब आया, जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट से जुड़े केस में आरोपी पत्रकार को जमानत दे दी। इस फैसले के बाद पूरे मामले में नए सवाल खड़े हो गए हैं, खासकर शिकायत दर्ज होने में हुई देरी को लेकर।
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बिलासपुर में जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और आरोपी पत्रकार मोहन निषाद को राहत प्रदान की।
मामले के अनुसार, बालोद जिले के डौंडीलोहारा थाने में दर्ज अपराध में मोहन निषाद पर भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट के तहत भी केस दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता मनीराम तारम, जो छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड में सहायक अभियंता हैं, ने आरोप लगाया था कि 17 अक्टूबर 2025 को एक व्यक्ति खुद को पत्रकार बताते हुए उनके पास आया और एक 11 वर्षीय बच्चे की करंट से मौत की खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर 2 लाख रुपये की मांग की।
शिकायत में यह भी कहा गया कि रकम नहीं देने पर आरोपी ने जातिसूचक गालियां दीं, धमकाया और सोशल मीडिया के जरिए उनकी छवि खराब करने की कोशिश की। इस मामले में पुलिस ने खिलावन चंद्राकर और मोहन निषाद के खिलाफ केस दर्ज किया था।
हालांकि, बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि मोहन निषाद एक न्यूज पोर्टल से जुड़े पत्रकार हैं और उन्होंने केवल खबर प्रकाशित की थी, जिसके चलते रंजिशवश उनके खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया गया। सबसे अहम बात यह रही कि घटना के करीब चार महीने बाद एफआईआर दर्ज की गई, जिससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी 18 मार्च 2026 से जेल में है और ट्रायल पूरा होने में समय लग सकता है। ऐसे में कोर्ट ने जमानत देना उचित समझा।
फिलहाल, इस फैसले से आरोपी को राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ट्रायल कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी, जहां अब यह तय होगा कि आरोपों के पीछे सच्चाई क्या है या यह पूरा मामला किसी और दिशा में मोड़ लेगा।
