जंगलों में फिर शुरू हुई ‘हरे सोने’ की दौड़… इस बार तेंदूपत्ता ने बदल दिए हजारों परिवारों के हालात

स्वतंत्र बोल
रायपुर ,10 मई 2026
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जेठ की झुलसा देने वाली गर्मी के बीच छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों एक अलग ही हलचल दिखाई दे रही है। सुबह सूरज निकलने से पहले ही ग्रामीण परिवार जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं और दोपहर तक उनके हाथों में होती हैं ‘हरे सोने’ की गड्डियां। इस बार तेंदूपत्ता सिर्फ वनोपज नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए उम्मीद, कमाई और बदलती जिंदगी का बड़ा सहारा बनकर उभरा है।

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कोरबा जिले के रामपुर क्षेत्र में तेंदूपत्ता संग्रहण सीजन की शुरुआत पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके साथ ही खरीदी केंद्रों पर भीड़ बढ़ने लगी और हर फड़ पर उत्सव जैसा माहौल दिखाई देने लगा। सबसे ज्यादा उत्साह महिलाओं में नजर आया, जो परिवार के साथ सुबह-सुबह जंगल पहुंचकर पत्तों की तुड़ाई में जुटी रहीं।

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रामपुर की श्रीमती कारी बाई पटेल और श्रीमती खेमबाई पटेल भी इस सीजन की पहली ‘बोहनी’ करने वालों में शामिल रहीं। दोनों महिलाओं ने बताया कि इस बार सरकारी खरीदी समय पर शुरू होने से उन्हें बिचौलियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ रहे। सीधे खरीदी केंद्र में पत्ता बेचने से सही दाम और बोनस मिलने की गारंटी मिली है।

इस बार शासन ने तेंदूपत्ता खरीदी की दर 4 हजार रुपये से बढ़ाकर 5500 रुपये प्रति मानक बोरा कर दी है। इस फैसले का असर अब गांवों में साफ दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि बढ़ी हुई दर से परिवारों की आमदनी में बड़ा फर्क पड़ेगा और सालभर की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी।

तेंदूपत्ता संग्रहण को लेकर इस बार प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क नजर आ रहा है। खरीदी केंद्रों पर गड्डियों की गिनती और गुणवत्ता जांच आधुनिक मानकों के आधार पर की जा रही है। भुगतान सीधे संग्राहकों के बैंक खातों में डिजिटल माध्यम से भेजा जा रहा है, जिससे देरी और गड़बड़ी की संभावना कम हो गई है।

वनोपज समिति प्रबंधकों के अनुसार इस बार मौसम अनुकूल रहने से पत्तों की गुणवत्ता पहले से बेहतर है। यही वजह है कि संग्राहकों की कमाई बढ़ने की उम्मीद और मजबूत हो गई है।

ग्रामीणों के लिए तेंदूपत्ता अब सिर्फ जंगल की उपज नहीं रहा, बल्कि उनके बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और बेहतर भविष्य का सबसे बड़ा सहारा बन चुका है। खासकर महिलाओं की मेहनत ने इस पूरे अभियान को नई ताकत दी है।

प्रशासन ने संग्राहकों से अपील की है कि वे तय सरकारी दरों पर केवल सहकारी समिति केंद्रों में ही तेंदूपत्ता बेचें, ताकि उन्हें बोनस और योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके।

रामपुर के जंगलों में इस बार सिर्फ पत्ते नहीं टूट रहे, बल्कि गरीबी और संघर्ष की पुरानी जंजीरें भी धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही हैं।