खून-पसीने से लिखी गई थी ये तारीख… 1 मई का वो इतिहास, जिसने मजदूरों की किस्मत बदल दी

स्वतंत्र बोल
रायपुर , 01 मई 2026:
नई दिल्ली में आज 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जा रहा है, जो दुनिया भर के मेहनतकश श्रमिकों के सम्मान और उनके अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक माना जाता है। यह दिन उन मजदूरों के संघर्ष, त्याग और मेहनत को याद करने के लिए समर्पित है, जिन्होंने अपने हक के लिए आवाज उठाई और इतिहास बदल दिया।

मजदूर दिवस की शुरुआत 19वीं शताब्दी के अंत में हुई, जब औद्योगिक क्रांति के दौर में कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों से 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था। खराब कामकाजी परिस्थितियों और लंबे समय तक काम करने से परेशान मजदूरों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू किया और आठ घंटे काम के अधिकार की मांग उठाई।

इस संघर्ष का सबसे बड़ा मोड़ 1 मई 1886 को आया, जब अमेरिका के शिकागो शहर में हजारों मजदूर सड़कों पर उतर आए और हड़ताल कर दी। इसके कुछ दिन बाद 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में एक सभा के दौरान हिंसा भड़क गई। बम विस्फोट और पुलिस फायरिंग में कई मजदूरों और पुलिसकर्मियों की जान चली गई। इस घटना को हेमार्केट अफेयर के नाम से जाना जाता है, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया।

इसके बाद 1889 में पेरिस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 1890 से यह दिन दुनिया के कई देशों में मनाया जाने लगा और धीरे-धीरे यह मजदूरों की एकता और अधिकारों का प्रतीक बन गया।

भारत में मजदूर दिवस पहली बार 1 मई 1923 को चेन्नई में मनाया गया था। इस आयोजन का नेतृत्व कम्युनिस्ट नेता मलयापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार ने किया था। इसी दिन भारत में पहली बार लाल झंडा फहराया गया और इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग उठाई गई।

आज के दौर में भी मजदूर दिवस का महत्व कम नहीं हुआ है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा, बेहतर कामकाजी परिस्थितियां और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना आज भी उतना ही जरूरी है, जितना पहले था। दुनिया के कई देशों में यह दिन छुट्टी के रूप में मनाया जाता है और श्रमिकों के योगदान को सम्मान दिया जाता है।