स्वतंत्र बोल
नारायणपुर ,07 अप्रैल 2026:घने जंगल, खामोश पहाड़ और हर कदम पर मौत का डर… Abujhmad का रेकावाया कभी ऐसा गांव था, जहां पहुंचना ही जान जोखिम में डालने जैसा था।लेकिन अब वही रेकावाया बदल चुका है—जहां कभी बंदूक की गूंज थी, वहां अब बच्चों की पढ़ाई और विकास की आवाज सुनाई दे रही है।
|
WhatsApp Group
|
Join Now |
|
Facebook Page
|
Follow Now |
|
Twitter
|
Follow Us |
|
Youtube Channel
|
Subscribe Now |
दहशत का वो दौर… जब बचपन भी कैद था
एक समय था जब इस गांव में न सरकार थी, न कानून—सिर्फ नक्सलियों का राज चलता था।
बच्चों को स्कूल में ABCD नहीं, बल्कि “B for Bomb” और “R for Rifle” सिखाया जाता था। हर रास्ता आईईडी और घात से भरा होता था। ग्रामीण दशकों तक डर और बंदूक के साये में जीने को मजबूर थे।
जब बदली तस्वीर… और टूटा खौफ का साम्राज्य
केंद्र और राज्य सरकार की रणनीति, सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों और सख्ती के बाद हालात बदलने लगे।
Amit Shah के नक्सलवाद खत्म करने के संकल्प के बाद अभियान तेज हुए। कई नक्सली मारे गए, हजारों ने सरेंडर किया और इलाके में एक के बाद एक पुलिस कैंप स्थापित हुए।
पहली सड़क… जो बनी उम्मीद की राह
रेकावाया तक जब पहली बार सड़क पहुंची, तो यह सिर्फ रास्ता नहीं था—यह बदलाव की शुरुआत थी।
इसके बाद प्रशासन भी गांव तक पहुंचा। Namrata Jain खुद गांव पहुंचीं—जहां कभी सरकारी कर्मचारी जाने से डरते थे।
‘सुशासन एक्सप्रेस’ बनी गांव की लाइफलाइन
गांव के लोगों के पास आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र जैसे बुनियादी दस्तावेज तक नहीं थे।
तब शुरू हुई ‘सुशासन एक्सप्रेस’—एक चलती-फिरती सरकारी व्यवस्था, जिसमें वाई-फाई, कंप्यूटर, प्रिंटर और आधार बनाने की पूरी सुविधा मौजूद है।
अब इसी के जरिए गांव में ही 27 तरह के दस्तावेज बनाए जा रहे हैं और हजारों लोगों को पहली बार अपनी पहचान मिली है।
जहां बंदूक थी… वहां अब किताबें हैं
जिस जगह कभी नक्सलियों का ‘जनताना सरकार स्कूल’ चलता था, अब वहां शासकीय छात्रावास और स्कूल बन चुके हैं।
अब बच्चे हथियार नहीं, बल्कि किताबों से अपना भविष्य लिख रहे हैं।
ग्रामीणों की जुबानी बदलाव की कहानी
गांव के लोग बताते हैं कि पहले कहीं जाने के लिए भी नक्सलियों की अनुमति लेनी पड़ती थी।
आज वे आजाद हैं—शहर देख रहे हैं, बैंक खाते खुलवा रहे हैं, योजनाओं का लाभ ले रहे हैं।
एक समय जो गांव नक्शे में था, लेकिन हकीकत में नहीं—अब वही गांव विकास की नई पहचान बन रहा है।
नई उम्मीद, नया रेकावाया
स्कूल, आंगनबाड़ी, सड़क, इंटरनेट, बैंकिंग—अब रेकावाया में वो सब पहुंच रहा है, जो कभी सपना भी नहीं था।
यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस बदलाव की है—जहां अंधेरे को चीरकर विकास की रोशनी पहुंची है।
