एक रात में बसा दी थी द्वारकापुरी! पढ़िए भगवान विश्वकर्मा की अलौकिक रचनाओं की पूरी कहानी

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नई दिल्ली 15 सितम्बर 2026. हर साल कन्या संक्रांति के दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा का पर्व मनाया जाता है। इस बार 17 सितंबर, गुरुवार को देशभर में विश्वकर्मा पूजा श्रद्धा और धूमधाम से मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य स्थापत्य कला और योगबल से ब्रह्मांड में कई अलौकिक संरचनाओं का निर्माण किया है। उन्होंने पौराणिक काल में ऐसी अद्भुत नगरियों और विमानों की रचना की, जिनकी भव्यता की मिसाल आज भी दी जाती है।

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भगवान शिव के लिए बनाई थी सोने की लंका

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भगवान विश्वकर्मा की महान रचनाओं में सोने की लंका का नाम सबसे ऊपर आता है। इसका निर्माण भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद उनके विश्राम के लिए किया गया था। विश्वकर्मा जी ने अपनी कला से पूरी लंका को शुद्ध सोने से बनाया था। हालांकि, बाद में लंकापति रावण ने इसे छल से प्राप्त कर लिया था।

समुद्र के बीच एक ही रात में रची द्वारकापुरी भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर विश्वकर्मा जी ने द्वारका नगरी का निर्माण किया था। उन्होंने समुद्र के भीतर 12 योजन के क्षेत्रफल में सुरक्षा, स्थापत्य शास्त्र और दिव्य कला का अद्भुत मेल पेश किया। देवशिल्पी ने महज एक ही रात में पूरी द्वारकापुरी तैयार कर दी थी। यह रचना उनकी अलौकिक शक्ति और कौशल का बड़ा उदाहरण है।

इंद्रपुरी से सिद्ध किया अपनी कला का लोहा

देवलोक में स्थित राजा इंद्र की नगरी इंद्रपुरी का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था। स्वर्गलोक की इस नगरी में अपार वैभव, दिव्य महल और बेहद सुंदर बगीचे शामिल थे। इंद्रपुरी की भव्यता और रास्तों की सुंदरता को देखकर हर कोई हैरान रह जाता था। इस रचना से उन्होंने पूरी सृष्टि में अपनी स्थापत्य कला का लोहा मनवाया, जिसकी प्रशंसा देवता और ऋषि-मुनि भी करते थे।

चालक की इच्छा से चलता था पुष्पक विमान

रामायण काल का पुष्पक विमान देवशिल्पी की दूरदर्शिता और विज्ञान की पराकाष्ठा का प्रतीक है। यह विमान मन की गति से चलता था और चालक की इच्छा के अनुसार अपना रूप व आकार बदल सकता था। विश्वकर्मा जी ने इसे सबसे पहले ब्रह्मदेव और बाद में कुबेर के लिए बनाया था। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह चालक के सोचते ही हवा में उड़ने लगता था।