स्वतंत्र बोल
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रायपुर, 20 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर अब हालात पूरी तरह बदलने वाले हैं। सरकार ने नया धर्म स्वातंत्र्य कानून लागू करते हुए ऐसे सख्त प्रावधान जोड़े हैं, जिनसे अवैध धर्मांतरण करने वालों पर कड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। अब जबरन, प्रलोभन या धोखाधड़ी के जरिए धर्म परिवर्तन कराने पर 7 से 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
इतना ही नहीं, यदि मामला सामूहिक धर्मांतरण का हो या इसमें महिला, नाबालिग अथवा एससी-एसटी वर्ग के लोग शामिल हों, तो सजा और भी भयावह हो सकती है। ऐसे मामलों में दोषियों को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा भुगतनी पड़ सकती है।
नए कानून के तहत धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को पूरी तरह नियंत्रित और पारदर्शी बनाया गया है। अब कोई भी व्यक्ति सीधे धर्म नहीं बदल सकेगा। इसके लिए पहले अधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना अनिवार्य होगा। आवेदन के बाद उसकी सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी और लोगों से आपत्तियां भी मांगी जाएंगी। जांच पूरी होने के बाद ही धर्म परिवर्तन को वैध माना जाएगा।
कानून में यह भी साफ किया गया है कि धर्मांतरण कराने वाले संस्थानों और व्यक्तियों के लिए पंजीयन अनिवार्य होगा। उन्हें हर साल अपनी गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट प्रशासन को देनी होगी। साथ ही ग्रामसभा की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई है, ताकि स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत हो सके।
एक और अहम प्रावधान यह है कि केवल विवाह के आधार पर किया गया धर्म परिवर्तन मान्य नहीं होगा। इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन जरूरी होगा। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म में वापस लौटता है, तो उसे धर्मांतरण की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस विधेयक को राज्य की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संतुलन के लिए बड़ा कदम बताया है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से कमजोर वर्गों को निशाना बनाकर प्रलोभन और दबाव के जरिए धर्मांतरण के मामले सामने आ रहे थे, जिससे सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ रहा था।
मुख्यमंत्री के अनुसार, नए कानून के लागू होने से ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगेगी और समाज में संतुलन व विश्वास कायम होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अब धर्म परिवर्तन से जुड़ी हर प्रक्रिया को कानूनी और पारदर्शी बनाना अनिवार्य होगा, जिससे किसी भी तरह की जबरदस्ती या धोखाधड़ी की गुंजाइश खत्म हो सके।
सरकार का दावा है कि यह कानून राज्य में शांति, सद्भाव और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा।
