स्वतंत्र बोल
रायपुर 22 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ में अनुकंपा नियुक्ति को लेकर Chhattisgarh High Court ने एक अहम और सख्त फैसला सुनाया है, जिसने सरकारी नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच के संबंध को साफ कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई व्यक्तिगत अधिकार या संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मदद के लिए दी जाने वाली व्यवस्था है।
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मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ए.के. प्रसाद ने कहा कि यदि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाला व्यक्ति अपने आश्रितों की देखभाल की जिम्मेदारी नहीं निभाता है, तो उसकी नौकरी भी छीनी जा सकती है। कोर्ट ने दोटूक शब्दों में कहा कि बहू को अपनी सास का भरण-पोषण करना होगा, अन्यथा उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है।
यह मामला अंबिकापुर निवासी ज्ञांती तिवारी के परिवार से जुड़ा है। उनके पति घनश्याम तिवारी पुलिस विभाग में कांस्टेबल थे, जिनका वर्ष 2001 में निधन हो गया था। इसके बाद उनके बेटे अविनाश तिवारी को अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। लेकिन दिसंबर 2021 में अविनाश की भी सेवा के दौरान मृत्यु हो गई।
इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी पत्नी नेहा तिवारी को अनुकंपा नियुक्ति दी, इस शर्त पर कि वह अपनी सास की देखभाल करेंगी। लेकिन सास का आरोप है कि नौकरी मिलने के बाद बहू का व्यवहार बदल गया और उसने उनकी देखभाल करना बंद कर दिया, यहां तक कि उन्हें बेसहारा छोड़ दिया।
इसी के चलते ज्ञांती तिवारी ने Chhattisgarh High Court में याचिका दायर की और बहू की नियुक्ति रद्द कर उनकी अविवाहित पोती को नौकरी देने की मांग की।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि बहू ने नियुक्ति के समय शपथ पत्र देकर सास की देखभाल का वादा किया था। कोर्ट ने कहा कि चूंकि बहू ने अपने पति के स्थान पर नौकरी प्राप्त की है, इसलिए उस पर वही जिम्मेदारियां लागू होती हैं, जो उसके पति पर अपनी मां के प्रति थीं।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की नीति के अनुसार यदि कोई कर्मचारी अपने आश्रितों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तो उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है।
यह फैसला न सिर्फ एक परिवार के विवाद का समाधान है, बल्कि यह उन सभी मामलों के लिए एक सख्त संदेश भी है, जहां अनुकंपा नियुक्ति को सिर्फ नौकरी समझ लिया जाता है, जिम्मेदारी नहीं।
