स्वतंत्र बोल
बिलासपुर, 29 अप्रैल 2026: जमीन विवाद में हुई निर्मम हत्या के एक सनसनीखेज मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी पिता-पुत्र को बड़ा झटका दिया है। तीन लोगों की बेरहमी से हत्या के मामले में सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।
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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि किसी भी अपराध में घायल गवाह की गवाही बेहद महत्वपूर्ण और विश्वसनीय साक्ष्य होती है। केवल इस आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता कि वह पीड़ित परिवार से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे गवाह घटनास्थल पर स्वाभाविक रूप से मौजूद होते हैं और उनके बयान की सुसंगतता व विश्वसनीयता को परखा जाना जरूरी है।
यह पूरा मामला तुमगांव थाना क्षेत्र के ग्राम जोबा का है, जहां 11 सितंबर 2020 की सुबह करीब 4 से 5 बजे के बीच जमीन बंटवारे को लेकर खूनी संघर्ष हुआ था। आरोपी परसराम गायकवाड़ और बृज सेन गायकवाड़ ने ओसराम गायकवाड़ के घर में घुसकर पहले उसकी और उसकी पत्नी जागृति की आंखों में मिर्च पाउडर फेंका, फिर खंजर से हमला कर दिया।
हमले से बचने के लिए ओसराम किसी तरह अपने भाई के घर भाग निकला, लेकिन आरोपियों का खौफनाक इरादा यहीं नहीं रुका। उन्होंने पीछे घर में मौजूद उसकी पत्नी जागृति, 16 वर्षीय बेटी टीना और 9 वर्षीय बेटे मनीष की गला काटकर हत्या कर दी। इतना ही नहीं, दरवाजा तोड़कर घर के अन्य सदस्यों—पुत्री गीतांजलि, ओमान और बुजुर्ग मां अनारबाई पर भी हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपियों को हिरासत में लेकर घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया। जांच पूरी होने के बाद मामला अदालत में पेश किया गया, जहां ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को विभिन्न धाराओं के तहत सख्त सजा सुनाई। इसमें हत्या के तीन मामलों में आजीवन कारावास समेत अन्य धाराओं में भी कारावास और जुर्माने की सजा शामिल है।
सजा के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति और घायल गवाहों के पीड़ित परिवार से जुड़े होने का हवाला देते हुए उनकी गवाही को अविश्वसनीय बताया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी बिना अनुमति के घर में घुसे, हत्या के इरादे से हमला किया और परिवार को गंभीर नुकसान पहुंचाया। ऐसे में उनकी दोषसिद्धि और सजा पूरी तरह न्यायसंगत है और इसमें किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।
इस फैसले के साथ ही यह साफ हो गया है कि जघन्य अपराधों में कानून की पकड़ से बचना आसान नहीं है, और निर्दोषों के खून का हिसाब अदालत में तय होकर ही रहता है।
