स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 16 जून 2026: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान फोन टैपिंग और उससे जुटाए गए साक्ष्यों की कानूनी वैधता को लेकर बड़ा संवैधानिक और तकनीकी सवाल खड़ा हो गया है। ‘श्री रविशंकर जी महाराज बनाम सीबीआई’ मामले में हाईकोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को नोटिस जारी करते हुए नए दूरसंचार नियमों के पालन को लेकर विस्तृत जवाब तलब किया है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता और सीबीआई दोनों को शपथ पत्र के साथ अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 24 घंटे के भीतर और सीबीआई को 24 जून 2026 तक सक्षम अधिकारी के माध्यम से जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 24 जून को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनु शर्मा ने सहयोगी अधिवक्ताओं पंकज पांडेय, राहुल अंबस्ट, गिरीश त्रिपाठी और कार्तिक खन्ना के साथ पक्ष रखा। उन्होंने ‘दूरसंचार नियम, 2024’ के नियम 3(3)(b) का हवाला देते हुए अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा उठाया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा 28 जून 2025 को जारी फोन इंटरसेप्शन (फोन टैपिंग) आदेश को नियमों के अनुसार सात कार्य दिवसों के भीतर रिव्यू कमेटी के समक्ष अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य था। यदि निर्धारित समय सीमा में इसकी पुष्टि नहीं होती, तो ऐसा आदेश स्वतः प्रभावहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस अवधि के बाद फोन टैपिंग से जुटाए गए किसी भी साक्ष्य को न्यायालय में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि मूल याचिका में 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी। बाद में एक अंतरिम आवेदन के माध्यम से अतिरिक्त आधार जोड़ने की अनुमति मांगी गई, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के चर्चित फैसले ‘द डायरेक्टर, सीबीआई बनाम पी. किशोर’ का भी उल्लेख किया गया। हालांकि, नए दूरसंचार नियमों के कथित उल्लंघन का मुद्दा स्पष्ट रूप से लिखित रूप में दर्ज नहीं था।
इस पर अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से रखी गई सभी दलीलों को शामिल करते हुए 24 घंटे के भीतर एक नया और स्पष्ट शपथ पत्र प्रस्तुत किया जाए तथा उसकी प्रति सीबीआई के अधिवक्ता वैभव ए. गोवर्धन को भी उपलब्ध कराई जाए।
वहीं सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि इसी एफआईआर से जुड़े एक अन्य सह-आरोपी की याचिका भी हाईकोर्ट में लंबित है, जिसे पहले ही 24 जून को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा चुका है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह केंद्र सरकार और जांच एजेंसी के सक्षम अधिकारियों से इस कानूनी एवं तकनीकी प्रश्न पर स्पष्ट निर्देश प्राप्त करे तथा 24 जून 2026 तक हर हाल में अपना जवाबी हलफनामा अदालत में प्रस्तुत करे।
अब सभी की निगाहें 24 जून की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय हो सकता है कि नए दूरसंचार नियमों के तहत की गई फोन टैपिंग और उससे प्राप्त साक्ष्यों की वैधता को लेकर अदालत क्या रुख अपनाती है। यह फैसला भविष्य में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और फोन इंटरसेप्शन से जुड़े मामलों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।


