SC-ST एक्ट पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी! सिर्फ आरोप नहीं, अब ‘जाति का सबूत’ भी जरूरी… फैसले ने बदली केस की दिशा


स्वतंत्र बोल
बिलासपुर, 26 अप्रैल 2026:
एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सामने आया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इस कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पीड़ित की जाति का ठोस और वैध प्रमाण होना अनिवार्य है।

बिलासपुर में जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभियोजन को यह साबित करना होगा कि पीड़ित वास्तव में अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित है और आरोपी उस वर्ग से नहीं है। इसके लिए वैध जाति प्रमाणपत्र पेश करना जरूरी माना गया है।

मामला एक अपील से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद के दौरान आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी। इस आधार पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 294, 323, 506/34 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने पहले आरोपियों को दोषी ठहराया था, लेकिन हाईकोर्ट में अपील के दौरान यह मुद्दा उठा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी दस्तावेज था, जिसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल यह दावा करना कि पीड़ित किसी विशेष जाति से है, पर्याप्त नहीं है। इसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध करना आवश्यक है। चूंकि इस मामले में वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए एससी-एसटी एक्ट के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया गया।

हालांकि, अदालत ने पूरी तरह राहत नहीं दी। गवाहों के बयानों के आधार पर आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा के उपयोग) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

इस फैसले ने साफ कर दिया है कि अब ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की मजबूती पहले से ज्यादा अहम हो गई है। साथ ही, यह निर्णय भविष्य में आने वाले मामलों की दिशा भी तय कर सकता है, जहां केवल आरोप नहीं बल्कि प्रमाण ही सबसे बड़ा आधार होंगे।