स्वतंत्र बोल
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नई दिल्ली,18 अप्रैल 2026: लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा बहुप्रतीक्षित संविधान संशोधन बिल उस वक्त अचानक धराशायी हो गया, जब इसे पारित कराने के लिए जरूरी बहुमत से 54 वोट कम पड़ गए। यह घटनाक्रम न सिर्फ संसद के भीतर, बल्कि पूरे देश की राजनीति में हलचल पैदा कर गया है। जहां एक ओर विपक्ष इस नतीजे को अपनी जीत बताकर जश्न मना रहा है, वहीं सत्ता पक्ष में गहरी नाराजगी और आरोपों की आंधी चल पड़ी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए विपक्ष पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने इसे देश की 70 करोड़ महिलाओं के साथ “धोखा” करार देते हुए सवाल उठाया कि “आधी आबादी का विश्वास तोड़ने के बाद कोई जश्न कैसे मना सकता है?” उनका यह बयान सामने आते ही सियासी माहौल और अधिक गरमा गया।
अमित शाह ने आगे कहा कि विपक्ष का यह जश्न हर उस महिला का अपमान है, जो वर्षों से अपने अधिकारों का इंतजार कर रही है। उन्होंने तीखे शब्दों में चेतावनी दी कि 2029 के आम चुनावों में जनता इस ‘विश्वासघात’ का जवाब जरूर देगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई बार जो जीत दिखाई देती है, वह दरअसल छिपी हुई हार होती है, जिसे कुछ लोग समझ नहीं पाते।
संसद के अंदर का माहौल भी कम नाटकीय नहीं रहा। कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों पर आरोप लगाते हुए अमित शाह ने कहा कि इन दलों ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित नहीं होने दिया। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले इस विधेयक का गिरना और उस पर जश्न मनाना उन्होंने “अकल्पनीय और निंदनीय” बताया।
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी चौंकाने वाली दिखती है। बिल को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या 352 थी, लेकिन इसके खिलाफ 230 वोट पड़े, जिससे यह ऐतिहासिक प्रस्ताव गिर गया। पिछले 12 वर्षों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका।
उधर, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए इसे “महिला विरोधी रुख” बताया। उन्होंने कहा कि यह दिन देश के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो सकता था, लेकिन विपक्ष के “घोर विश्वासघात” ने इस मौके को छीन लिया।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ एक विधेयक का गिरना है, या फिर इसके पीछे आने वाले समय की बड़ी राजनीतिक पटकथा लिखी जा चुकी है। संसद में जो हुआ, उसकी गूंज आने वाले चुनावों तक सुनाई दे सकती है—और सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस ‘हार’ का असली असर किसे भुगतना पड़ेगा।
