143 बीट, 750 जल स्रोत और हाईटेक निगरानी से टला बड़ा संकट, लगातार 3 साल तक एक भी जान नहीं गई

स्वतंत्र बोल
गरियाबंद,20 अप्रैल 2026
। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में हर गर्मी के साथ एक खामोश खतरा सिर उठाता था। सूखते जल स्रोत, भड़कती आग और पानी की तलाश में भटकते जंगली जानवर—हालात ऐसे बनते थे कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता था। लेकिन इस बार तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व ने एक ऐसी रणनीति अपनाई, जिसने इस छिपे खतरे को जड़ से खत्म कर दिया। ‘फायर-वॉटर’ मॉडल के जरिए जंगल में ऐसा सुरक्षा कवच तैयार किया गया, जिसने न सिर्फ वन्यजीवों को बचाया बल्कि इंसानी जिंदगी को भी सुरक्षित रखा।

रिजर्व के सभी 143 फॉरेस्ट बीट में विशेष ‘फायर वॉचर्स’ और ‘वॉटर वॉचर्स’ की टीमें तैनात की गई हैं। ये टीमें हर पल जंगल पर नजर रखती हैं। गर्मी में जहां आग लगने का डर सबसे ज्यादा होता है, वहीं थर्मल ड्रोन और सैटेलाइट निगरानी के जरिए हर हलचल पर नजर रखी जा रही है। इस सख्ती का असर ऐसा रहा कि आग लगाने के आरोप में 23 लोगों को पकड़ लिया गया और आग की घटनाएं तेजी से कम हो गईं।

लेकिन असली खेल पानी ने बदला। जंगल के भीतर ही 750 से ज्यादा छोटे जल स्रोत तैयार किए गए, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘झिरिया’ कहा जाता है। इसके साथ ही 26 सौर-संचालित पंप उन इलाकों में लगाए गए, जहां पानी की सबसे ज्यादा कमी थी। नतीजा यह हुआ कि भालू, तेंदुए, लकड़बग्घे और हाथी जैसे खतरनाक जानवर अब गांवों की ओर नहीं भटकते।

पहले जहां हर गर्मी में इंसान और जानवर आमने-सामने आ जाते थे, अब वही टकराव लगभग खत्म हो चुका है। इस पूरी रणनीति ने अवैध शिकार पर भी कड़ी चोट की है। एंटी-पोचिंग टीमों ने अंतरराज्यीय शिकार गिरोहों पर कार्रवाई कर जंगल को और सुरक्षित बना दिया है।

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि पिछले तीन सालों में गर्मी के मौसम के दौरान यहां एक भी इंसान या वन्यजीव की जान नहीं गई। यह उपलब्धि इसलिए और अहम हो जाती है क्योंकि इसी दौरान ग्रामीण बड़ी संख्या में जंगलों में महुआ, साल बीज, चिरौंजी और तेंदूपत्ता इकट्ठा करने जाते हैं।

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व का यह मॉडल अब पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन चुका है। जहां कभी खतरा हर कोने में छिपा था, वहीं अब उसी जंगल में सुरक्षा की एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी हो चुकी है, जिसने हर संभावित हादसे को होने से पहले ही रोक दिया।