क्या स्वेच्छा से देह व्यापार करना कानूनन अपराध है? जानिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा

Bilaspur highcourt

स्वतंत्र बोल
बिलासपुर 16 अक्टूबर 2026:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने देह व्यापार से जुड़े एक मामले में तीन महिलाओं को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने राज्य शासन की अपील खारिज करते हुए कहा कि अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 4 के तहत सजा देने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति की देह व्यापार से होने वाली कमाई पर अपना जीवनयापन कर रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से देह व्यापार में शामिल होना अपने आप में इस धारा के तहत अपराध नहीं है।

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क्या था पूरा मामला?

यह मामला 11 जुलाई 2013 का है। पुलिस को कोरबा के महाराणा प्रताप नगर स्थित एक मकान में देह व्यापार संचालित होने की सूचना मिली थी। इसके बाद पुलिस ने छापेमारी कर नौ आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इनमें से तीन महिलाओं पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 6 और 7 के तहत आरोप तय किए गए थे।

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कोरबा के ट्रायल कोर्ट ने 28 अगस्त 2014 को तीनों महिलाओं को धारा 6 और 7 के आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि, अदालत ने उन्हें धारा 4 के तहत दोषी ठहराते हुए दो-दो साल के कठोर कारावास और 500-500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट, कोरबा ने महिलाओं को धारा 4 के आरोप से भी बरी कर दिया। राज्य शासन ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने धारा 4 पर क्या कहा?

जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि धारा 4 लागू करने के लिए यह साबित होना चाहिए कि आरोपी किसी अन्य व्यक्ति की देह व्यापार से होने वाली कमाई पर जानबूझकर निर्भर था।

अदालत ने पाया कि तीनों महिलाओं के खिलाफ किसी अन्य महिला की कमाई पर जीवनयापन करने या दलाली करने का आरोप साबित नहीं हुआ था। ऐसे में केवल देह व्यापार में शामिल होने के आधार पर उन्हें धारा 4 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से देह व्यापार करना अपने आप में अपराध नहीं है और केवल इसी आधार पर किसी महिला को दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य शासन की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही तीनों महिलाओं को धारा 4 के आरोप से बरी किए जाने का फैसला बरकरार रहा।