स्वतंत्र बोल
नई दिल्ली 15 अक्टूबर 2026: भारत में धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभ को लेकर स्थिति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले और हालिया अदालती रुख के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या धर्म बदलने से व्यक्ति का आरक्षण समाप्त हो जाता है? कानूनी प्रावधानों के अनुसार, देश में एससी (SC), एसटी (ST), ओबीसी (OBC) और ईडब्ल्यूएस (EWS) श्रेणियों के लिए आरक्षण के नियम अलग-अलग हैं। केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से हर श्रेणी पर एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति किस वर्ग से संबंधित है और उस पर कौन सा कानूनी प्रावधान लागू होता है।
एससी (SC) आरक्षण: हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक सीमित नियम
संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के पैरा 3 के अनुसार, अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण का लाभ केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों को ही मिल सकता है। यदि कोई व्यक्ति एससी समुदाय से ताल्लुक रखता है और वह इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह एससी दर्जे के आधार पर मिलने वाले आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कानूनी प्रावधान को स्पष्ट किया है कि धर्म बदलने के बाद एससी आरक्षण का लाभ स्वतः समाप्त हो जाता है।
एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) आरक्षण की क्या है स्थिति?
अनुसूचित जनजाति (ST) के मामले में नियम एससी से काफी अलग हैं। एसटी की संवैधानिक सूची में शामिल जनजातियों के लिए एससी जैसी धर्म आधारित कठोर पाबंदी नहीं है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई आदिवासी व्यक्ति किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो केवल इस आधार पर उसका एसटी दर्जा अपने आप खत्म नहीं होता, हालांकि उसे अपनी जनजातीय पहचान और अन्य पात्रता शर्तें पूरी करनी होती हैं। वहीं, ओबीसी (OBC) आरक्षण के मामले में मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि केवल धर्म बदलकर पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर नया पिछड़ा वर्ग का दर्जा नहीं मांगा जा सकता। इसके लिए संबंधित समुदाय का कानूनी रूप से मान्य सूची में होना जरूरी है।


